May 15, 2026

जागरुक हुई जनता: अब चाहती है कालाढूंगी में ऐसा नेता

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Kaladhungi Status for 2027 Eection
  • विजन के साथ ही समस्याओं का निराकरण करने वाला और युवा पीढ़ी को गलत रास्ते पर जाने से बचाने वाला ही जीतेगा यहां!

उत्तराखंड में होने वाले 2027 के चुनावों को लेकर प्रदेश तकरीबन सभी जिलों में नेताओं ने तैयारियां शुरु कर दी हैं। इस बीच देवभूमि में जिस सबसे ज्यादा हाट व बदलाव वाली सीट को लेकर लोगों के बीच चर्चा है, वह है नैनीताल जिले की कालाढूंगी सीट।

लंबे समय से एक निश्चित नेता व पार्टी का गढ़ रही ये सीट अब अपना मूड बदलती दिख रही है। खास बात ये है कि इस बदलते मूड के पीछे का कारण बीजेपी नहीं हैं, बल्कि लगातार एक ही नेता का चेहरा और विकास की धीमी रफ्तार है। ऐसे में यहां के लोग इस बार विशेष रुप से मुखर होते हुए कहते दिखाई देते हैं कि हमें इस बार बदलाव चाहिए वो भी लोगों की परेशानियों को समझने वाले और उसके निदान का विजन रखने वाले जनप्रतिनिधि के रूप में…

दरअसल कालाढूंगी में वर्तमान विधायक बंशीधर भगत के प्रति क्षेत्र की जनता में व्याप्त आक्रोश केवल चुनावी नाराजगी नहीं है, बल्कि लोगों का तो यहां तक कहना है कि यह “विज़न की कमी” और “बुनियादी मुद्दों की अनदेखी” का एक गंभीर विषय है।

मैं नहीं तो मेरा पुत्र, ने और ज्यादा बिगाड़ा समीकरण
यहां ये भी जान लें​ कि जहां तक वर्तमान विधायक बंसीधर भगत के पुत्र विकास भगत को इस बार यहां से टिकट देने की बात है, तो कई लोगों के अनुसार इस बार ये भी समझ लेना उचित है कि बंसीधर भगत को लेकर लोगों में इस कदर नाराजगी व्याप्त है। कि लोगों कि इस नाराजगी का असर सीधा उनके बेटे के चुनाव में खड़े होने पर भी दिखेगा।

Kaladhungi Mission 2027: इस बार क्या चाहती है कालाढ़ूंगी की सीट

इस पूरी खीचतान में जहां विकास भगत को भले ही अपने पिता कि विरासत के तहत चुनाव लड़ने का मौका मिल जाए। लेकिन जनता की पिता से नाराजगी का खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। इसके चलते जहां भाजपा को अपनी इस सीट या यूं कहें गढ़ को गंवाना पड़ सकता है, तो वहीं विकास के राजनैतिक कॅरियर पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ने की संभावना है।

​दरअसल विभिन्न मुद्दों को आधार बनाकर जो स्थिति सामने आती दिख रही है उसके अनुसार, जो दिख रहा है वह काफी तथ्य परक व चौंकाने वाला है…

​कालाढूंगी: ‘विज़न’ बनाम ‘औपचारिकता’ की राजनीति

यहां ​क्षेत्र की जनता में नाराजगी के पीछे ये 5 मुख्य कारण दिखाई देते हैं:

​1. वन्यजीव संघर्ष और सुरक्षा का अभाव
वन क्षेत्र के जानकारों के अनुसार ​कालाढूंगी का एक बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र से लगा है। हाथियों और बाघों के बढ़ते आक्रमणों के बावजूद ठोस सुरक्षा इंतजाम (जैसे फेंसिंग या दीवारों का पुख्ता प्रबंध) न होना जनता की जान-माल के प्रति संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो सीधे तौर पर लोगों के जीवन से जुड़ा है।

​2. बुनियादी ढाँचे का संकट (अस्पताल और सड़कें)
​स्वास्थ्य सेवाएं: आपातकालीन स्थिति में आधुनिक अस्पताल की कमी और पुरानी सड़कों का न बनना क्षेत्र के पिछड़ेपन का प्रमाण है।

​नियमित ज़रूरतें: लोगों के अनुसार रोज़मर्रा की ज़रूरतों जैसे पानी, बिजली और संपर्क मार्गों की बदहाली ने स्थानीय लोगों के धैर्य की सीमा को तोड़ दिया है।

​3. “शुभ-अशुभ” की राजनीति (Social Presence vs Action)
​नाम न छापने की शर्त पर लोगों ने काफी गंभीर आरोप लगाते हुए ये तक कह दिया कि विधायक जी केवल सामाजिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गए हैं।

​सक्रियता का भ्रम: वहीं राजनीति के जानकारों का मानना है कि आज की बदलती पस्थिति में सामाजिक कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराना व्यक्तिगत संबंध तो बनाता है, लेकिन यह विकास का विकल्प नहीं हो सकता।

​कार्यात्मक सहयोग का अभाव: राजनीति से जुड़े लोग भी ये मानते हैं कि किसी ज़रूरी काम या समस्या के समाधान में सहयोग न मिलना समर्थकों को विरोधी बनाने का सबसे बड़ा कारण बनता है।

​​4. दूरदर्शी सोच (Vision) की कमी
​जनता अब केवल “सड़क-नाली” तक सीमित नहीं है। युवाओं को रोज़गार, पर्यटन का विकास और वन क्षेत्र की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए एक ब्लूप्रिंट चाहिए। माना जाता है कि विज़न की कमी के कारण क्षेत्र दशकों पुराने ढर्रे पर चल रहा है, जिससे शिक्षित वर्ग और नई पीढ़ी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।

​5. कोर वोटर का विकल्प की ओर झुकाव
कालाढ़ूंगी के कई क्षेत्रों की तरह ही बिठौरिया जैसे क्षेत्रों में भी लोगों के द्वारा ये कहना कि भाजपा का कोई दूसरा नया चेहरा (जिसके पास विजन हो, और समयस्याओं के निदान के प्रति पूरी तरह से सक्रीय हो व जो अधिकारियों के पैंच में फंसी तरक्की की फाइलों को भी तुरंत समाधान के साथ निकाल सके) मैदान में न आने पर वे नोटा, निर्दलीय या यूकेडी की ओर मुड़ने का विचार (बिठौरिया के कई लोगों ने नाम को छुपाकर रखने की शर्त पर बातचीत के दौरान इसका खुलासा किया) कर सकते हैं। यह साबित करता है कि अब “चेहरा नहीं, समाधान” प्राथमिकता है।

6. नशे का बढ़ता जाल और नेतृत्व की विफलता
​कालाढूंगी में बढ़ता नशा केवल एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की आने वाली पीढ़ी की बर्बादी का संकेत है। इसके लिए क्षेत्र के कई लोग समय पर कार्रवाई न होने व इस ओर ध्यान न दिए जाने को मानते हैं। नशे की गिरफ्त में फंसे बच्चों के माता पिता व जिनके बच्चे अ​भी अत्यंत छोटे हैं उनका का तो यहां तक कहना है कि जो नशे को क्षेत्र से हटाकर हमारे बच्चों को सुरक्षित बनाने पर कार्य करेगा हम उसका समर्थन करेंगे।

​युवाओं का पतन: क्षेत्र के युवाओं को नशे की गिरफ्त में जाने से इसका सीधा असर परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर पड़ता है।

​प्रशासनिक उदासीनता: जानकारों का यह भी कहना है जनप्रतिनिधि का काम केवल सड़क बनाना नहीं, बल्कि समाज को सुरक्षित रखना भी है। नशे के सौदागरों पर कार्रवाई न होना या इस मुद्दे पर चुने गए प्रतिनिधियों की चुप्पी जनता को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या इसमें “मौन सहमति” है?

ध्यान देने की बात ये है कि आज के दौर ​की राजनीति में जनता की समस्याएं केवल हाथ जोड़कर बैठने या औपचारिकता निभाने से हल नहीं होतीं।

​सक्रियता बनाम प्रतीकात्मकता: लोग अब ऐसे नेता को चाहते हैं जो उनके बच्चों के भविष्य के लिए एक विजन पर काम करें, वह न कि सिर्फ कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराए बल्कि अपनी ओर से भी क्षेत्र की जनता के भले व युवा पीढ़ी को नशे से बर्बाद होने से बचाने के लिए कार्य करे।

एक कारण यह भी: बंसीधर भगत के जल्दबाजी में खुद की जगह पुत्र को टिकट दिलाने वाले बयान ने भी जनता को काफी नाराज किया है। कारण ये है कि यहां की जनता जो वोट उन्हें देती है उसमें भाजपा के समर्थकों की संख्या बहुत अधिक है, ऐसे में पार्टी जिन कारणों से कांग्रेस पर हमला करती रही है यानी जहां पार्टी का स्टैंड एकदम कांग्रेस से अलग है, वहां भगत पार्टी के स्टैंड को धत्ता बताते हुए कांग्रेस के स्टैंड की तरह परिवारवाद की राजनीति में उतर आए। उनका यह कदम उनके लिए अत्यंत घातक बन गया और सीधे भाजपा से जुड़े लोग जो कभी उनके समर्थक थे, वे भी उनके विरोध में उतर आए।

जनता क्या चाहती है…
कालाढूंगी के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लोगों से की गई चर्चा के आधार पर संक्षिप्त में जानकारी दें, तो जो बातें सामने आईं उनके अनुसार अब क्षेत्र की जनता केवल कार्यक्रमों में उपस्थिति वाला नेता नहीं चाहती। वह ये तो चाहती है कि नेता हमारे सुख दुख में शामिल हो, लेकिन साथ ही एक शानदार दृष्टिकोण यानी विजन वाले जनप्रतिनिधि को वह चयनित करना चाहती है।

इसके साथ ही लोगों ने यह भी बताया कि अब युवाओं का समय है तो कोई भी 55 वर्ष की आयु से अधिक का नेता उनके लिए ज्यादा रुचिकर नहीं होगा। क्योंकि वह एक कार्यकाल के बाद ही 60 का हो जाएगा। जबकि ऐसा नेता जिसने दुनिया भी देखी हो और वह हमारी समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए उनके निकारण के लिए भी पुरी तरह से तैयार हो युवा पीढ़ी को गलत रास्ते पर जाने से बचाए, इसके साथ ही विजन वाला हो, तो वह हमारी प्राथमिकता में होगा।

 

Awakened-public now want some one special for Kaladhungi Vidhansabha

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