उत्तराखंड भाजपा में हो सकता है बवाल! जानें कौन से हैं बड़े कारण
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बीजेपी में टूट की आशंका तेज़
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यूजीसी नियमों और अंकिता केस से जनता नाराज़
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कार्यसमिति सदस्यों के चयन में देरी से कार्यकर्ता बेचैन
- कोर वोटर्स का असर बिगाड़ेगा चुनावी गणित
देहरादून/पिथौरागढ़/चमोली/अल्मोड़ा/श्रीनगर। उत्तराखंड भाजपा में जल्द ही दो फाड़ हो सकते हैं! इसका कारण यह है कि जनता व भाजपा के अपने लोगों में पार्टी के रूख को लेकर विशेष नाराजगी इन दिनों देखी जा रही है। एक ओर जहां पार्टी से जुड़े कई लोग व जनता यूजीसी नियमों को लेकर नाराज बने हुए हैं वहीं अंकिता भंडारी मर्डर केस ने भी पार्टी की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है।
यहां तक की वर्तमान के कई पार्टी से जुड़े लोगों ने नाम न छापने / बताने की शर्त पर कहा कि इन दिनों उनमें से कई जब जनता से मिलते हैं तो कई जगह जनता सीधे एक ही बात कहती है कि हमने तुम्हें वोट दिया और तुम्हारी पार्टी ने यूजीसी लाकर हमारे ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई, अब क्या हमसे बात करते हुए आपको शर्म भी महसूस नहीं होती। इसके अलावा अनेक लोग तो अंकिता को लेकर सीधे सवाल करते हैं कि यदि सरकार सही थी तो उस होटल पर बुल्डोजर चलाने की इतनी जल्दी क्या थी जांच तो पूरी हो जाने देते, कम से कम अब जब सीबीआई आई है तो उसे भी तो उस होटल से सबूत जुटाने देते। इसके अलावा भी कई ऐसे सवाल आते हैं जिनके सामने हमें अपनी नजरें झुकानी पड़ जातीं हैं, यहां तक की कई दफे तो हमें यह तक बताने में शर्म महसूस होती है कि हम बीजेपी से हैं।
इसके साथ ही पार्टी के बिखरने का एक अन्य व बड़ा कारण कार्यसमिति के सदस्यों की अब तक नियुक्ति न होना भी है। दरअसल अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल, श्रीनगर, चमोली, देहरादून आदि क्षेत्रों से कई कार्यकर्ता कार्यसमिति में सदस्य बनाए जाने की उम्मीद लंबे समय से लगाए बैठे हैं। लेकिन, अब तक इसकी घोषणा नहीं किए जाने से ये अब बैचेन (असंतोष बढ़ रहा है) होने लगे हैं।
ऐसे में पार्टी के कई सिपाही उसका दामन छोड़ यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) जैसे अन्य दलों के साथ जल्द ही जुड़ने पर विचार करते नजर आ रहे हैं। दरअसल अब ये इस पूरी स्थिति को इस तरह देख रहे हैं कि पहले तो जनता वैसे ही इस समय बीजेपी से नाराज चल रही है, जिसके कारण जो पार्टी के लोग जनता के सामने भी जाते हैं उन्हें तक कई बार शर्मसार होना पड़ रहा है। वहीं विचारधारा को लेकर इनमें से अनेक का मानना है कि हां काग्रेस से हमारी विचारधारा नहीं मिलती, लेकिन यूकेडी तो हमारा पहाड़ी ही दल है। और उत्तराखंड वैसे भी पहाड़ के कारण ही पहाड़ी राज्य बना।
इसके अलावा कार्यसमिति का सदस्य बनने की राह में इंतजार करने वाले अनेक लोगों का तो यहां तक कहना है कि पार्टी की ओर से ये देरी भी एक राजनैतिक चाल है। ताकि कोई अभी से विरोध में न उतरे जिससे चुनाव तक स्थिति और न बिगड़े, क्योंकि अभी पहले से ही यूजीसी व अंकिता भंडारी कैस को लेकर लोगों में मौजूद नाराजगी को संभालना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में इनके भी विरोध में आने से पार्टी उत्तराखंड में चुनाव से पहले ही साख खो देगी, जो चुनाव 2027 में भारी पड़ सकता है। अत: अभी कैसे भी करके इन्हें चाहे खाली दिलासा ही देकर पार्टी में रोके रखो। जिससे चुनाव के आसपास तक तो पार्टी एक साथ दिखे, जिससे भ्रमित होकर जनता हमें ही वोट कर पुन: सत्ता में लाए।
कारण ये है कि समय से पहले यदि विरोध सामने आया तो जनता भी भड़क जाएगी और जिस क्षेत्र की जनता जिसकी समर्थक हैं उसके साथ चल देगी। इसका चुनाव में बड़ा नुकसान होगा।
नाराज लोगों को मानना है कि कुल मिलाकर पार्टी केवल लालच देकर लोगों को कुछ समय तक संतुष्ट रखना चाहती है। इसके बाद चुनाव के आसपास सदस्यों की घोषणा करेगी ताकि नाराज लोग उन्हें ज्यादा नुकसान न पहुंचा सके। कारण ये है कि अंतिम समय में दूसरे दल में जाने पर दूसरा दल न तो उन्हें ज्यादा भाव देगा और न ही वे अपने टिकट की दावेदारी को ज्यादा जोर से रख पाएंगे। ऐसे में वे ये सोच कर संतुष्ट होते हुए पहली पार्टी के लिए ही काम करने को मजबूर हो जाएंगे कि चलो अभी तो कहीं जाना फायदेमंद नहीं है, यहां लंबे समय से जुड़ा हूं सब जानते भी हैं तो अभी यही बना रहता हूं।
इसके अलावा चुनाव से ठीक पहले जिन सदस्यों का चयन किया जाएगा। पार्टी उन पर इतनी जिम्मेदारी लाद देगी, जिसमें वे दबने लगेंगे, लेकिन साथ ही उन्हें (चुनाव दौरान तक ये अहसास भी कराया जाएगा) ये भी लगेगा कि जीत हुई तो हम ही उसके कारण होंगे। जबकि बाद में पुन: इन्हें एक तरफ फैंक दिया जाएगा। यहां ये भी याद रखें कि इस बार पार्टी को भी हार की आशंका है फिर भी यदि पार्टी अभी के मुकाबले कम सीटों से जीती (सीटें कम होना लगभग तय भी है) तो इसका ठीकरा भी अपनी कार्यप्रणाली पर नहीं बल्कि इन्हीं सदस्यों पर फोड़ा जाएगा।
ऐसे में अब जो संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार पार्टी में अगले कुछ समय में एक बड़ी टूट सामने आ सकती है, चाहे ये निचले स्तर (सामान्य कार्यकर्ता व हाई लेवल से नीचे के नेता) पर ही हो। लेकिन इसके बाद फिर एक बार बड़ी टूट चुनाव से ठीक पहले हो सकती है। जिसे लेकर वर्तमान में भी चर्चा है कि कई मजबूत लोग अभी से दूसरे दलों के साथ टच में बने हुए हैं। ये खास तौर पर वे मजबूत लोग हैं जिनका पार्टी में अच्छा कद है, लेकिन अंतिम समय में आने वाली सदस्यों की टीम से यदि वे खुद को उपेक्षित पाते हैं। तो समर्थकों के साथ अन्य दल के साथ जा सकते हैं।
पहले से टच में रहने से इन्हें ये लाभ होगा कि वे एक तो वर्तमान पार्टी की नीतियों को अच्छे से जानते हैं तो उसकी काट बना सकते हैं। वहीं अभी से टच में रहने के चलते जब वे दूसरी पार्टी ज्वाइन करेंगे तो दूसरा दल एक तो उनको ज्यादा भाव देगा और साथ ही उनकी टिकट की दावेदारी को नजरंदाज भी नहीं कर पाएगा। इससे वे उस पार्टी के समर्थकों के साथ ही भाजपा के वोट बैंक में भी कुछ हद तक सेंध लगाने में कामयाब हो सकेंगे। वहीं यूजूसी से नाराज लोग ऐसे लोगों को हाथों हाथ लेते हुए पूर्ण समर्थन दे सकते हैं।
कोर वोटर बिगाड़ेगा गणित
लंबे समय से लगातार बीजेपी का कोर वोटर भी इस बार छिटकता हुआ दिख रहा है। ऐसे में यूजीसी के चलते इस वोटर को जहां अच्छा प्रत्याशी मिलेगा। साथ ही जो भाजपा छोड़ कर आया होगा और ये प्रचारित कर देगा कि यूजीसी के विरोध में मैंने पार्टी छोड़ दी क्योंकि मैं इसका समर्थन नहीं करता हूं। साथ ही यदि वह भाजपा की ठीक उल्टी विचारधारा की पार्टी के साथ नहीं गया तो यूजीसी का विरोध करने वाला भाजपा का कोर वोटर उसे हाथों हाथ लेते हुए, जीत की धकेल देगा।
ऐसे में यदि वर्तमान परिस्थितियों में देखें तो भाजपा उत्तराखंड में जनता की नाराज़गी + कार्यकर्ताओं की बेचैनी + कार्यसमिति सदस्यों के चयन में देरी, ये तीनों स्थितियां मिलकर पार्टी को भीतर से कमजोर कर रही हैं।
Uttarakhand BJP will soon face internal conflict
