March 9, 2026

17 साल बाद लंदन से बांग्लादेश लौटे तारिक रहमान, क्या बदलेंगे देश की राजनीतिक इबारत?

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नई दिल्ली। बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर ऐतिहासिक मोड़ पर है। 12 फरवरी को हुए आम चुनाव ने देश की सत्ता की दिशा तय करने का मंच तैयार कर दिया। इस बार अवामी लीग की गैरमौजूदगी ने मुकाबले को पूरी तरह नया रंग दिया है और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभरी है। पार्टी के चेहरा हैं तारिक रहमान, जिन्होंने 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद लंदन से लौटकर राजनीतिक परिदृश्य में धमाकेदार एंट्री की। उनकी वापसी केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि बांग्लादेश की सियासत के नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।

कौन हैं तारिक रहमान
तारिक रहमान बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं। उन्हें राजनीतिक विरासत परिवार से मिली और 1990 के दशक में उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 2001 से 2007 तक वे बीएनपी में बेहद प्रभावशाली नेता रहे। उस दौर में उन्हें ‘डार्क प्रिंस’ कहा जाता था क्योंकि वे पर्दे के पीछे रणनीति बनाने वाले नेता के रूप में जाने जाते थे। संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत थी और युवा कार्यकर्ताओं में उनका प्रभाव विशेष रूप से महसूस किया जाता था।

निर्वासन और कानूनी चुनौतियां
2007 में सैन्य समर्थित सरकार के दौरान तारिक रहमान पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उन्हें जेल जाना पड़ा। बाद में इलाज के लिए वे लंदन चले गए और वहीं से पार्टी की गतिविधियों का संचालन करते रहे। 2018 और 2021 में उन्हें भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और 2004 के ग्रेनेड हमले से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया गया था। हाल ही में अदालतों ने कई फैसलों को पलट दिया, जिससे उनके देश लौटने का रास्ता साफ हो गया।

पत्नी डॉ जुबैदा रहमान
तारिक रहमान की पत्नी डॉ जुबैदा रहमान पेशे से चिकित्सक हैं और लंदन से उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं। उन्होंने सरकारी सेवा में भी शीर्ष स्थान हासिल किया था। हाल ही में राजनीतिक बदलावों के बाद उनके खिलाफ सजा पर रोक लग गई है।

बेटी जायमा रहमान

तारिक रहमान की बेटी जायमा रहमान 30 वर्ष की हैं और कानून की पढ़ाई कर चुकी हैं। उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की और बीएनपी की वर्चुअल बैठकों में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही हैं।

बांग्लादेश का भविष्य
तारिक रहमान की वापसी ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं। समर्थक इसे लोकतांत्रिक संतुलन की वापसी बता रहे हैं, जबकि आलोचक उनके पुराने मामलों को याद दिला रहे हैं। अब यह देखने वाली बात है कि क्या वे चुनावी जीत के साथ सत्ता संभाल पाएंगे और देश की राजनीति को नई दिशा दे पाएंगे। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि बांग्लादेश की राजनीतिक धारा तय करने वाला मोड़ भी साबित हो सकता है।

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