उत्तराखंड के सांस्कृतिक स्वरूप व सौहार्द की रक्षा को उठाए कठोर कदम : धामी
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आध्यात्मिक आभा के कारण उनके माता-पिता ने उनका नाम ‘पुष्कर’ रखा

देहरादून : मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राजस्थान के अजमेर स्थित अखिल भारतीय उत्तराखंड धर्मशाला आश्रम, तीर्थराज पुष्कर के द्वितीय तल का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड संपूर्ण भारत की आस्था और संस्कृति का केंद्र है। इस पवित्र भूमि के सांस्कृतिक व मूल स्वरूप और सौहार्द की रक्षा के लिए राज्य सरकार ने कई महत्वपूर्ण और कठोर निर्णय लिए हैं। जबरन मतांतरण के विरुद्ध कठोर कानून लागू किया गया। लैंड जिहाद, लव जिहाद और थूक जिहाद जैसी घृणित मानसिकता पर कड़ी कार्रवाई की जा रही है। मुख्यमंत्री धामी ने तीर्थराज पुष्कर की पावन भूमि पर स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री ब्रह्मा मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना भी की।
रविवार को मुख्यमंत्री ने पुष्कर में आश्रम निर्माण के लिए उत्तराखंड सरकार की ओर से पूर्व में दी गई एक करोड़ रुपये की सहयोग राशि का उल्लेख करते हुए इसके लिए 50 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता प्रदान करने की घोषणा भी की। उन्होंंने कहा कि उत्तराखंड में दंगारोधी कानून लागू कर दंगाइयों से ही क्षति की भरपाई की व्यवस्था की गई है। प्रदेश में हरा-नीला–पीला कपड़ा लगाकर सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों को चिह्नित कर 10 हजार एकड़ से अधिक भूमि को मुक्त कराया गया। देश में सबसे पहले समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की गई, जिससे सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था सुनिश्चित हुई। प्रदेश में नया कानून लागू कर मदरसा बोर्ड समाप्त किया गया और सभी विद्यालयों में सरकारी बोर्ड मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम अनिवार्य किया गया। 250 से अधिक अवैध मदरसों को बंद किया गया। आपरेशन कालनेमि के तहत धार्मिक स्थलों पर भेष बदलकर पाखंड फैलाने वाले तत्वों पर सख्त कार्रवाई जारी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य देवभूमि में अलगाववादी सोच नहीं बल्कि ज्ञान और संस्कार के मंदिर स्थापित करना है। मुख्यमंत्री धामी ने तीर्थराज पुष्कर की आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धार्मिक ग्रंथों में पुष्कर, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, गया और प्रयाग को पंचतीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है। मुख्यमंत्री ने भावुक होते हुए बताया कि संभवतः इसी आध्यात्मिक आभा के कारण उनके माता-पिता ने उनका नाम ‘पुष्कर’ रखा। उन्होंने प्रवासी उत्तराखंडियों से आह्वान किया कि वे जहां भी रहें, अपने राज्य की संस्कृति और परंपराओं को गर्व से आगे बढ़ाएं।
