# दशानन सूत्र: आज बात लंकेश की …
@डॉ.आशीष द्विवेदी की कलम से…

जिसके जीवन से मिले सबक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं
आज विजयादशमी है। लंकेश के संहार का दिन। रावण शब्द में भयावहता है, घृणा है, आक्रोश है, नाराजगी है, उलाहना है किंतु इन सबसे भी बड़ा है- अहंकार, दंभ, घमंड, मद, ढीठता। यह तो सभी जानते हैं कि सीता जी को ससम्मान वापस करने और श्रीराम की शरण में जाने को लेकर पवनपुत्र हनुमान जी, युवराज अंगद ने भरसक प्रयास किया किंतु रावण का हृदय परिवर्तन न हुआ।
यह तथ्य उतना सर्वज्ञात नहीं हैं कि जानकी के अनैतिक हरण की उसके आसपास के लगभग सभी श्रेष्ठियों ने भी एक स्वर में निंदा कर उन्हें ससम्मान लौटाने की सीख दी । उसके कृत्य को अक्षम्य अपराध बताया। दशानन की अत्यंत गुणवान पत्नी मंदोदरी ने समझाया कि राम से शत्रुता करना ठीक नहीं है, सीता को लौटा देने में लंका की भलाई है। तब रावण ने हंसते हुए कहा कि तुम औरतों का स्वभाव ही होता है, जब कोई मंगल कार्य होता है तो तुम डरने लगती हो। वानर और इंसान हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
रावण के दोनों ही अनुज कुंभकर्ण और विभीषण ने भी रावण को यही सलाह दी कि राम से नाहक ही आप बैर मोल ले रहे हैं वह नारायण के अवतार हैं। रावण ने उसे भी अनसुना कर दिया। उल्टे विभीषण को तो बुरी तरह अपमानित कर राज्य से ही निष्कासित कर दिया। कुंभकर्ण अवश्य मन मारकर युद्ध हेतु पहुंचे और अंत में वीरगति को प्राप्त हुए। रावण की सभा में माल्यवंत नाम का एक वृद्ध और बेहद अनुभवी मंत्री था। माल्यवंत ने भी अपने स्वामी दशानन को समझाने का प्रयास किया था और राम को सीता लौटाने पर ज़ोर दिया था, लेकिन रावण ने उनका भी तिरस्कार किया और माल्यवंत को मूर्ख घोषित कर दिया।
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एक समय तो रावण के परमवीर और परमप्रिय पुत्र मेघनाथ ने भी विनीत भाव से कहा था कि पिताजी सीताजी को लौटाकर युद्ध विराम कीजिए। किंतु मद में चूर रावण ने अपने पुत्र की बात भी नकार दी। रावण के दो गुप्तचर सुक और सारण ने तो युद्ध के पूर्व ही रावण को बता दिया था कि राम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। राम की क्षमता और उनके अस्त्र-शस्त्र ऐसे हैं कि वे अकेले ही नगर को नष्ट कर सकते हैं, उनसे विवाद करना व्यर्थ है। शांति स्थापित कर मैथिली को दशरथ नंदन को लौटा दीजिए।
रावण ने न इस पक्ष की बात सुनी और न उस पक्ष की वो तो बस अपनी हठधर्मिता पर अड़ा रहा। आखिर में एक- एक संबंधी, शुभचिंतक, सेनानायक काल – कवलित होते गए। अंत में जब स्वयं की बारी आई तब भी उसका हृदय परिवर्तन न हुआ। श्रीराम के बाणों से शरीर छलनी हो गया। अपने अहम से सब विनाश कर लिया न सिर्फ स्वयं का अपितु स्वर्णिम लंका और राक्षस कुल भी। रामायण में सीखने के लिए जितने महत्वपूर्ण राम हैं उतना ही महत्वपूर्ण रावण का पात्र भी है।
सूत्र यह है कि रावण एक मूल्यवान सीख है कि अनाचार, अनीति, अन्याय के मार्ग पर चलने वाले का एक दिन यही हश्र होता है। वो भले हनुमान जी और अंगद के प्रस्ताव को ठुकरा देता किंतु अपनी पत्नी, भाई, पुत्र, मंत्री और दूत की समवेत स्वर में की जा रही सीख में से किसी एक को भी सुन लेता तो विध्वंस नहीं होता। परंतु…..विनाश काले विपरीत बुद्धि।
शुभ मंगल
# दशानन सूत्र
