अमेरिकी चुनाव में ट्रंप की करारी हार, संसद पर पकड़ खत्म होने से अब राष्ट्रपति के सामने खड़ी होंगी कई बड़ी चुनौतियां
इस चुनावी हार का सबसे बड़ा असर ट्रंप की राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में यह उनका दूसरा कार्यकाल है और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार वह तीसरी बार राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते। ऐसे में उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनाव के बाद सत्ता से बाहर होना है। इसी वजह से संसद में बहुमत गंवाने के बाद उनके राजनीतिक प्रभाव को कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी राजनीति में ऐसी स्थिति को लेम डक राष्ट्रपति कहा जाता है, जिसमें कार्यकाल जारी रहने के बावजूद नेता का राजनीतिक प्रभाव कम होने लगता है।
रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी इसका असर दिखाई दे सकता है। वर्ष 2028 के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर संभावित उम्मीदवारों की दौड़ शुरू होने के साथ पार्टी के नेता अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटेंगे। ऐसे में कई नेता ट्रंप की सलाह और प्राथमिकताओं से अलग रास्ता अपना सकते हैं। पार्टी के सांसदों पर उनकी पकड़ कमजोर होने से सरकार के फैसलों को लेकर भी मतभेद बढ़ने की संभावना है।
प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत मिलने के बाद महत्वपूर्ण संसदीय समितियों की कमान भी उसके हाथ में आ जाएगी। ये समितियां सरकार के कामकाज की जांच और निगरानी करती हैं। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों और उनके करीबी लोगों को विभिन्न मामलों में जवाब देने के लिए बुलाया जा सकता है। राष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान हुए वित्तीय और प्रशासनिक फैसलों की जांच भी तेज हो सकती है। इनमें वर्ष 2025 में ट्रंप के नाम पर हुई 20 हजार से अधिक स्टॉक डील्स का मामला भी शामिल है।
डेमोक्रेट्स के पास प्रतिनिधि सभा में बहुमत होने से ट्रंप के खिलाफ तीसरी बार महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की राजनीतिक संभावना भी बन सकती है। हालांकि, महाभियोग प्रस्ताव पारित कराने और राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाओं तथा सदनों में आवश्यक समर्थन की जरूरत होती है।
विधायी मोर्चे पर भी ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। संसद में रिपब्लिकन पार्टी अल्पमत में होने के कारण नए कानूनों, बजट और टैक्स सुधारों से जुड़े प्रस्तावों को पारित कराना चुनौतीपूर्ण होगा। डेमोक्रेट्स सरकार के प्रस्तावों का विरोध कर सकते हैं और कई योजनाओं को रोकने की कोशिश कर सकते हैं। राष्ट्रपति के पास विधेयकों पर वीटो लगाने का अधिकार जरूर है, लेकिन संसद निर्धारित प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति के वीटो को भी खारिज कर सकती है।
चुनावी नतीजों के पीछे महंगाई, पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, स्वास्थ्य सेवाओं का महंगा होना और ईरान युद्ध से जुड़ी नीतियों को प्रमुख कारण बताया गया है। इन मुद्दों पर मतदाताओं की नाराजगी का असर रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन में दिखाई दिया। संसद में विपक्ष की मजबूती के बाद विदेशी अभियानों और रक्षा संबंधी अतिरिक्त खर्च के लिए भी ट्रंप प्रशासन को अधिक राजनीतिक और वित्तीय समर्थन जुटाना पड़ सकता है।
इस बदलाव का असर भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। ट्रंप प्रशासन की ओर से विभिन्न देशों पर आयात शुल्क बढ़ाने की धमकियों के बीच अमेरिकी संसद में विपक्ष की मजबूत स्थिति उनके एकतरफा फैसलों पर राजनीतिक दबाव बढ़ा सकती है। भारत के लिए यह स्थिति व्यापार वार्ता में अपने हितों को मजबूती से रखने का अवसर बन सकती है। अमेरिका भारतीय उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण बाजार है, इसलिए टैरिफ और व्यापार समझौते से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के संबंधों में अहम बने रहेंगे।
कुल मिलाकर, मध्यावधि चुनाव के नतीजे ट्रंप के शेष कार्यकाल की राजनीतिक परिस्थितियों को बदल सकते हैं। अब उन्हें संसद में विपक्ष के बहुमत, अपनी पार्टी के भीतर उभरती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और घरेलू आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार चलानी होगी। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप इन बदली परिस्थितियों में अपनी नीतियों को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
