October 30, 2026

इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

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नई दिल्ली ।इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान कराया गया। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य अभियान के साथ ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार की आलोचना होती रही है। ऐसे में चुनाव के परिणाम देश की राजनीति और आने वाली सरकार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र थे। नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख और मध्यमार्गी नेता गादी आइजेनकोट प्रमुख चुनौती के रूप में मैदान में हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी उनके राजनीतिक गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में दोनों पक्षों के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिले थे। हालांकि, इजरायल की गठबंधन आधारित राजनीतिक व्यवस्था के कारण किसी एक दल या गठबंधन के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

77 वर्षीय बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव में इन मुद्दों का असर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी विपक्षी खेमे में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। इस तरह नेतन्याहू के सामने अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं का संयुक्त मुकाबला है।

चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में बयान दिया था। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर ट्रंप की प्रशंसा की थी। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता होने की बात कही। चुनाव के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का यह समर्थन भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहा।

इजरायल में संसदीय चुनाव की प्रक्रिया भारत से अलग है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर मतदान होता है। पूरे देश को एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है। मतदाता किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल की सूची के पक्ष में वोट डालते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए संसद यानी नेसेट के 120 सदस्यों का चयन किया जाता है।

संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक दल को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत प्राप्त करना जरूरी है। इस व्यवस्था के कारण कई छोटे दल भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं और संसद में उनकी मौजूदगी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण हो सकती है।

इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना सकता। चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की संभावना होती है।

इसके बाद राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनाने को लेकर बातचीत होती है। यदि कोई दल या गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ऐसी स्थिति में छोटे दलों और गठबंधन सहयोगियों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।

इस चुनाव के परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी। नई सरकार की संरचना का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, गाजा और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों तथा अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। अंतिम राजनीतिक तस्वीर मतदान के परिणाम और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं से स्पष्ट होगी।

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