तुर्किये-पाकिस्तान के साथ इंडोनेशिया के रक्षा समझौते से ब्रह्मोस तकनीक पर सवाल, विशेषज्ञों ने बताई भारत की सुरक्षा रणनीति
भारत ने जुलाई 2026 में इंडोनेशिया के साथ करीब 630 मिलियन डॉलर यानी लगभग 5,300 करोड़ रुपये के दो रक्षा समझौते किए थे। इनमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल की बिक्री से संबंधित समझौते शामिल हैं। ऐसे में चार देशों के नए रक्षा सहयोग को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इंडोनेशिया के दूसरे देशों के साथ बढ़ते सैन्य संबंधों का इन सौदों पर कोई प्रभाव पड़ेगा या नहीं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में विशेषज्ञों ने केवल बद्र MoU के आधार पर भारतीय मिसाइल तकनीक को खतरा मानने की आशंका को उचित नहीं बताया है।
डीआरडीओ के चेयरमैन एमेरिटस और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व महानिदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक सुधीर कुमार मिश्रा के अनुसार, इंडोनेशिया के साथ हुए समझौतों में तकनीकी जानकारी की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान शामिल किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया को हथियारों के इस्तेमाल से संबंधित उपयोगकर्ता पुस्तिका दी जाएगी, न कि तकनीक हस्तांतरण से जुड़ी पुस्तिका। उनके मुताबिक, समझौतों में डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार और रक्षा संप्रभुता से जुड़े सख्त प्रावधान भी शामिल हैं, जिनका पालन इंडोनेशिया को करना होगा।
मिश्रा की राय में, इन सुरक्षा उपायों के रहते ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों की संवेदनशील तकनीक भारत के प्रतिद्वंद्वियों तक पहुंचने की आशंका नहीं है। हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए जरूरी जानकारी साझा करना और उनके निर्माण या तकनीकी विकास से जुड़ी विस्तृत जानकारी हस्तांतरित करना अलग-अलग बातें हैं। यही अंतर भारत के रक्षा निर्यात समझौतों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रक्षा विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत ने भी भारत-इंडोनेशिया रक्षा सौदों के प्रभावित होने की अटकलों को खारिज किया। वह सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज में वरिष्ठ फेलो हैं। उनके अनुसार, किसी समझौता ज्ञापन को सैन्य गठबंधन के बराबर नहीं माना जा सकता। केवल एक MoU पर हस्ताक्षर होने से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पहले से तय रक्षा निर्यात सौदे खतरे में पड़ गए हैं।
अहलावत ने बद्र समझौते की भाषा को रक्षा अनुसंधान एवं विकास में सहयोग और कार्य विभाजन की व्यवस्था के रूप में देखा। उनके मुताबिक, यह साझा इस्लामी पहचान वाले देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में तालमेल बढ़ाने की कोशिश भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि भारत को इस घटनाक्रम पर नजर रखनी चाहिए, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक चिंता नहीं करनी चाहिए। किसी देश को हथियार बेचने का अर्थ यह नहीं है कि उसे उनके निर्माण और विकास की पूरी तकनीक भी सौंप दी जाए।
भारत के लिए आगे सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि बद्र MoU के तहत चारों देशों के बीच रक्षा अनुसंधान, सैन्य उत्पादन और तकनीकी सहयोग किस स्तर तक बढ़ता है। साथ ही, भारत-इंडोनेशिया समझौतों में तय सुरक्षा प्रावधान किस तरह लागू होते हैं, यह भी अहम रहेगा। फिलहाल विशेषज्ञों की राय है कि नए रक्षा सहयोग पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन केवल इस समझौते के आधार पर ब्रह्मोस और अस्त्र की तकनीक की सुरक्षा को लेकर खतरे का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
