अंग्रेजों के सामने वंदेमातरम का उद्घोष, RSS संस्थापक हेडगेवार के जीवन पर बनी AI शॉर्ट फिल्म की खास उपलब्धि
फिल्म की कहानी वर्ष 1905 के बंग-भंग आंदोलन और ब्रिटिश शासन के दौर से शुरू होती है। उस समय वंदेमातरम राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन रहा था। फिल्म में वर्ष 1907 की उस घटना को भी दिखाया गया है जब नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में पढ़ने वाले किशोर केशव बलिराम हेडगेवार ने ब्रिटिश स्कूल इंस्पेक्टर के निरीक्षण के दौरान पूरी कक्षा से वंदेमातरम का नारा लगवाया था। इस प्रसंग के माध्यम से फिल्म में उस दौर के विद्यार्थियों के बीच विकसित हो रही राष्ट्रवादी चेतना और अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध को दर्शाया गया है।
फिल्म में वर्ष 1908 में मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के रामपायली में दशहरे के अवसर पर दिए गए हेडगेवार के भाषण का भी चित्रण किया गया है। इस भाषण को सीमोल्लंघन के नाम से जाना जाता है। इसके बाद उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलने और परिवार को दमन का सामना करने से जुड़े प्रसंग भी फिल्म की कहानी में शामिल किए गए हैं। इन घटनाओं के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है कि ब्रिटिश शासन के दौरान राष्ट्रवादी विचारों को व्यक्त करने वालों को किस तरह की कानूनी और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता था।
फिल्म की कहानी आगे बढ़ते हुए वर्ष 1930 के यवतमाल जंगल सत्याग्रह तक पहुंचती है। इसमें डॉ. हेडगेवार की गिरफ्तारी और अकोला जेल यात्रा से जुड़े प्रसंगों को शामिल किया गया है। फिल्म में रेलवे स्टेशनों पर उनके स्वागत के लिए जुटने वाली भीड़ और वंदेमातरम के नारों को प्रभावशाली दृश्यों तथा संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसके अलावा वर्ष 1937 में प्रांतीय सरकारों के गठन के दौर में राष्ट्रगीत के सम्मान की रक्षा के लिए उनके संकल्प को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया है। इस तरह फिल्म स्वतंत्रता आंदोलन के अलग-अलग चरणों को एक साथ जोड़ते हुए हेडगेवार के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों को सामने लाती है।
निर्देशक डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने कहा कि वंदेमातरम केवल एक गीत या नारा नहीं है बल्कि भारत की स्वाधीनता का बीज मंत्र और राष्ट्रीय चेतना की अमर ध्वनि है। उनके अनुसार डॉ. हेडगेवार का जीवन मातृभूमि की वंदना और इस मंत्र के सम्मान के लिए समर्पित रहा। उन्होंने बताया कि फिल्म बनाने का उद्देश्य नई पीढ़ी को इतिहास के उन प्रसंगों से परिचित कराना है जिनमें त्याग और राष्ट्रभक्ति को विशेष महत्व दिया गया था।
डॉ. लोकेन्द्र सिंह इससे पहले बाचा : द राइजिंग विलेज समिधा गो-वर और कद जैसी फिल्मों से भी जुड़े रहे हैं। उनकी ये फिल्में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही जा चुकी हैं। अब एआई तकनीक के माध्यम से बनाई गई उनकी पहली शॉर्ट फिल्म का उज्जैनी शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल में चयन उनके फिल्म निर्माण के सफर की एक नई उपलब्धि है। फिल्म की स्क्रीनिंग के जरिए दर्शकों को डॉ. हेडगेवार के जीवन और वंदेमातरम से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों को एक नए सिनेमाई रूप में देखने का अवसर मिलेगा।
