October 21, 2026

मंगल के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी लाएगा जापान का मिशन, 20 अक्टूबर को एच3 रॉकेट से होगी ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत

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नई दिल्ली । जापान मंगल ग्रह और उसके चंद्रमाओं से जुड़े रहस्यों को समझने के लिए एक महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन (एमएमएक्स) नाम के इस मिशन का मुख्य उद्देश्य मंगल के चंद्रमा फोबोस की सतह से मिट्टी के नमूने एकत्र करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। इसके लिए जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी का एच3 रॉकेट 20 अक्टूबर को तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से उड़ान भरने वाला है। इस मिशन को मंगल के आसपास के क्षेत्र से नमूने लाने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यान मंगल तक पहुंचने के बाद फोबोस की परिक्रमा करेगा और वहां से नमूने एकत्र करके पृथ्वी की ओर लौटेगा।

मिशन की योजना के मुताबिक, अंतरिक्ष यान को मंगल तक पहुंचने में लगभग एक वर्ष लगेगा। इसके बाद यह करीब तीन साल तक फोबोस की परिक्रमा करेगा और उसकी सतह का अध्ययन करेगा। अभियान के दौरान कम से कम 10 ग्राम मिट्टी एकत्र करने का लक्ष्य रखा गया है। नमूनों को लेकर अंतरिक्ष यान के 2031 में पृथ्वी पर लौटने की योजना है। यदि यह अभियान निर्धारित योजना के अनुसार सफल होता है, तो वैज्ञानिकों को मंगल के चंद्रमाओं की संरचना और उनकी उत्पत्ति के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त हो सकेगी।

इस अभियान में आईडेफिक्स नाम का एक रोवर भी शामिल है। इसका नाम प्रसिद्ध फ्रांसीसी कॉमिक पात्र एस्टेरिक्स के कुत्ते के नाम पर रखा गया है। रोवर का काम फोबोस की सतह का निरीक्षण करना और लैंडिंग के लिए उपयुक्त स्थान का आकलन करने में मदद करना है। फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण बेहद कमजोर है, इसलिए वहां सुरक्षित उतरना और सतह से नमूने एकत्र करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। इसी वजह से अंतरिक्ष यान के उतरने वाले पैरों और सतह पर स्थिर रहने की व्यवस्था विकसित करना इस मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

एमएमएक्स का उद्देश्य केवल मिट्टी के नमूने पृथ्वी पर लाना नहीं है। इस अभियान से वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि मंगल और उसके दोनों चंद्रमा फोबोस तथा डीमोस कैसे बने। अंतरिक्ष यान पृथ्वी की ओर लौटने से पहले डीमोस का भी निरीक्षण करेगा, लेकिन वहां उतरने की योजना नहीं है। दोनों चंद्रमाओं की बनावट, संरचना और विशेषताओं का अध्ययन मंगल के आसपास के क्षेत्र के इतिहास को समझने में मदद कर सकता है।

मंगल के चंद्रमाओं की उत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों के बीच प्रमुख रूप से दो परिकल्पनाएं चर्चा में हैं। पहली विशाल टकराव परिकल्पना के अनुसार, किसी बड़े खगोलीय पिंड के मंगल से टकराने के बाद निकले पदार्थ से उसके चंद्रमाओं का निर्माण हुआ हो सकता है। दूसरी परिकल्पना के मुताबिक, फोबोस और डीमोस मूल रूप से क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल के गुरुत्वाकर्षण ने अपनी कक्षा में खींच लिया। फोबोस से प्राप्त मिट्टी के नमूनों का विश्लेषण इन दोनों संभावनाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इस शोध का महत्व सौरमंडल के दूसरे हिस्सों तक भी फैला हुआ है। बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे चट्टानी ग्रहों के निर्माण और विकास को समझने से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि ग्रहों पर जीवन के अनुकूल वातावरण किन परिस्थितियों में विकसित हुआ। फोबोस की मिट्टी में मौजूद पदार्थों और खनिजों का अध्ययन इस दिशा में उपयोगी जानकारी दे सकता है।

यह मिशन अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी उदाहरण है। इसमें फ्रांस के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र, जर्मन एयरोस्पेस सेंटर, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और लगभग 20 विश्वविद्यालयों तथा तकनीकी कंपनियों का सहयोग शामिल है। इस अभियान से भविष्य में मंगल की खोज और वहां मानव अभियानों की तैयारी के लिए जरूरी तकनीकों को समझने में भी मदद मिल सकती है।

जापान इससे पहले चंद्रमा पर उतरने के लिए स्मार्ट लैंडर फॉर इन्वेस्टिगेटिंग मून यानी स्लिम मिशन भेज चुका है। इसे मून स्नाइपर भी कहा जाता है। वर्ष 2024 में चंद्रमा की सतह पर उतरने के बाद यह पलट गया था, लेकिन इसके बावजूद इसने डेटा भेजना जारी रखा और चंद्रमा की कई लंबी रातों के दौरान भी सक्रिय रहा। अब एमएमएक्स मिशन के जरिए जापान मंगल के चंद्रमाओं से नमूने लाने और ग्रहों की उत्पत्ति से जुड़े सवालों के उत्तर खोजने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।

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