October 16, 2026

इंडस्ट्रियल एरिया में मनमाने आवासीय निर्माण पर रोक, जमीन की कीमत ₹250 प्रति वर्गमीटर तय, पुराने निर्माण सुरक्षित

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भोपाल । मध्य प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्रों में आवासीय परियोजनाओं के विकास और औद्योगिक जमीन के आवंटन को लेकर राज्य सरकार ने नए नियम लागू किए हैं। इन नियमों के तहत अब औद्योगिक क्षेत्रों में नई आवासीय परियोजनाओं के लिए रो-हाउस और अलग-अलग आवासीय प्लॉट बनाने की अनुमति नहीं होगी। यहां केवल बहुमंजिला फ्लैट या समूह आवास परियोजनाएं ही विकसित की जा सकेंगी। सरकार के इस फैसले का उद्देश्य औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन के इस्तेमाल को व्यवस्थित करना और आवासीय निर्माण को तय मानकों के अनुरूप रखना है। औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन विभाग ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। नए नियम केवल नई परियोजनाओं पर लागू होंगे। पहले से संचालित आवासीय योजनाओं और मौजूदा निर्माण पर इनका असर नहीं पड़ेगा।
नई व्यवस्था के अनुसार औद्योगिक क्षेत्रों में फ्लैट आधारित आवासीय परियोजनाओं के तहत सिंगल बेडरूम और डबल बेडरूम की इकाइयां बनाई जा सकेंगी। इसके अलावा छात्रावास और उनसे जुड़ी सामाजिक सुविधाओं के विकास की भी अनुमति होगी। ये प्रावधान अधिसूचित आवासीय भूमि पर विकसित होने वाली परियोजनाओं के साथ औद्योगिक इकाइयों को आवंटित जमीन पर बनाई जाने वाली कैप्टिव आवासीय सुविधाओं पर भी लागू होंगे। हालांकि किसी भी परियोजना का निर्माण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी लेना जरूरी होगा। निर्माण कार्य मास्टर प्लान और विकास योजना के साथ भवन उपविधियों तथा भूमि आवंटन की शर्तों के अनुसार करना होगा। अग्नि सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी मानकों का पालन भी अनिवार्य रहेगा।
सरकार ने औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन की कीमत तय करने का आधार भी निर्धारित किया है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विकसित या विकसित किए जाने वाले औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन का मूल्य संबंधित क्षेत्र की असिंचित कृषि भूमि के लिए निर्धारित कलेक्टर गाइडलाइन को 0.6 से भाग देकर निकाला जाएगा। हालांकि इस गणना के बाद भी जमीन की कीमत 250 रुपये प्रति वर्गमीटर से कम नहीं रखी जा सकेगी। यदि तय प्रक्रिया के अनुसार मूल्य इससे कम निकलता है तो मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम यानी एमपीआईडीसी के प्रबंध संचालक को संचालक मंडल की अनुमति से कीमत बढ़ाने का अधिकार होगा।
भूमि आवंटन में निवेश की सीमा से अधिक जमीन मांगने वाली औद्योगिक इकाइयों के लिए भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। निर्धारित निवेश के आधार पर जितनी जमीन पर छूट मिल सकती है उससे अधिक आवंटित क्षेत्रफल पर छूट नहीं दी जाएगी। उदाहरण के तौर पर यदि कोई इकाई संयंत्र और मशीनरी में 200 करोड़ रुपये का निवेश करती है और उसे 25 हेक्टेयर जमीन आवंटित होती है तो 20 हेक्टेयर तक ही छूट मिलेगी। शेष पांच हेक्टेयर पर यह लाभ लागू नहीं होगा। नियमों में 40 हेक्टेयर तक भूमि आवंटन पर प्रीमियम की गणना के दौरान जमीन के मूल्य में 50 प्रतिशत छूट का भी उल्लेख है। अन्य औद्योगिक प्रयोजनों के लिए प्रीमियम की गणना में भी भूमि मूल्य पर 50 प्रतिशत छूट का प्रावधान दिया गया है।
औद्योगिक इकाइयों को आवंटित जमीन का पूरा उपयोग नहीं होने पर अनुपयोगी हिस्से के हस्तांतरण की व्यवस्था भी तय की गई है। इसके तहत संचालित इकाई अपनी आवंटित जमीन में से अधिकतम 50 प्रतिशत या कम से कम 5000 वर्गमीटर तक अनुपयोगी भूमि को अलग सड़क मार्ग उपलब्ध होने की शर्त पर विभाजित कर दूसरे पक्ष को हस्तांतरित कर सकेगी। इसके लिए मूल आवंटी को हस्तांतरण की तारीख तक भू-भाटक और संधारण शुल्क समेत सभी बकाया राशि का भुगतान करना होगा। आवंटन अभिलेख में जरूरी संशोधन के साथ समर्पण अभिलेख निष्पादित और पंजीकृत कराना भी अनिवार्य होगा।
नए नियमों में भूमि और भवन आवंटन के लिए एमपीआईडीसी के अधिकारियों के अधिकार भी निर्धारित किए गए हैं। औद्योगिक भवनों का आवंटन क्षेत्रीय कार्यालय के कार्यकारी संचालक के अधिकार क्षेत्र में रहेगा। औद्योगिक क्षेत्रों में आवासीय और व्यावसायिक प्रयोजन के लिए 10000 वर्गमीटर तक जमीन आवंटित करने का अधिकार क्षेत्रीय कार्यालय के कार्यकारी संचालक को दिया गया है जबकि इससे अधिक क्षेत्रफल के आवंटन का अधिकार प्रबंध संचालक के पास रहेगा। इसके अलावा सार्वजनिक निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल पर औद्योगिक आवास परियोजनाएं शुरू करने का प्रावधान भी किया गया है।
सरकार ने निजी औद्योगिक पार्कों के साथ निर्यात पार्कों और प्लग-एंड-प्ले तथा लॉजिस्टिक पार्कों के लिए भी दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं। निजी डेवलपर को परियोजना का विकास अपने खर्च और जोखिम पर करना होगा। जरूरत पड़ने पर वह विशेष प्रयोजन वाहन यानी एसपीवी बना सकेगा और परियोजना की मान्यता तथा प्रोत्साहन संबंधी प्रावधानों के लिए एमपीआईडीसी के साथ समझौता कर सकेगा। कुल मिलाकर नए नियम औद्योगिक जमीन के उपयोग और आवंटन की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने की दिशा में उठाया गया कदम हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इनका प्रभाव नई परियोजनाओं पर ही पड़ेगा और पहले से बने आवासीय परिसरों या वहां रह रहे लोगों को इससे प्रभावित नहीं किया जाएगा।

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