October 11, 2026

350 करोड़ की जमीन का विवाद फिर चर्चा में, अयोध्यापुरी मामले में कंपनी की रजिस्ट्री वैध, रहवासी संघ ने दी हाईकोर्ट जाने की चेतावनी

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इंदौर। शहर की अयोध्यापुरी कॉलोनी की करीब चार एकड़ बेशकीमती जमीन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में जिला कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला न्यायाधीश डॉ. शुभ्रा सिंह की अदालत ने सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस कंपनी के पक्ष में फैसला देते हुए अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ के दावों को खारिज कर दिया।
विवादित जमीन की मौजूदा कीमत करीब 350 करोड़ रुपये बताई जा रही है। अदालत ने 65 पेज के फैसले में देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था की ओर से कंपनी के पक्ष में की गई रजिस्ट्री को वैध माना है। इस निर्णय के बाद फिलहाल जमीन के स्वामित्व को लेकर कंपनी की कानूनी स्थिति मजबूत हुई है। हालांकि रहवासी संघ ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है जिससे इस मामले में आगे भी कानूनी लड़ाई जारी रहने की संभावना है।
अयोध्यापुरी की इस जमीन को लेकर विवाद का प्रमुख मुद्दा उसके स्वामित्व और सहकारी संस्था की ओर से किए गए हस्तांतरण की वैधता रहा है। अदालत में रहवासी कल्याण संघ की ओर से जमीन पर अपने दावे प्रस्तुत किए गए थे। वहीं कंपनी की ओर से जमीन की खरीद और रजिस्ट्री की प्रक्रिया को वैध बताया गया। सुनवाई के बाद अदालत ने 24 फरवरी 2007 को कंपनी के पक्ष में हुई रजिस्ट्री को कानूनी रूप से वैध माना। फैसले के अनुसार संस्था की वार्षिक आमसभा में प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद जमीन बेचने की प्रक्रिया पूरी की गई थी।
अदालत ने विवादित अतिरिक्त जमीन पर संस्था के सदस्यों के व्यक्तिगत भूखंड होने के दावे को भी पर्याप्त दस्तावेजों के अभाव में स्वीकार नहीं किया। मामले में संस्था के पास कुल 6.75 लाख वर्गफीट जमीन होने का पक्ष रखा गया था। इसमें सदस्यों को प्लॉट आवंटित किए जाने के बाद बची हुई जमीन कंपनी को बेचे जाने की बात कही गई। रहवासी संघ की ओर से ऐसा ठोस दस्तावेज लेआउट या नक्शा प्रस्तुत नहीं किया जा सका जिससे विवादित अतिरिक्त जमीन पर किसी सदस्य का व्यक्तिगत भूखंड होना साबित हो सके।
फैसले में संस्था और कंपनी के बीच हुए अनुबंध तथा रजिस्ट्री में धोखाधड़ी के पर्याप्त प्रमाण भी नहीं पाए गए। इसी आधार पर जमीन के हस्तांतरण को अवैध घोषित करने की मांग स्वीकार नहीं की गई। इस निर्णय के साथ जिला कोर्ट ने रहवासी संघ के दावों को खारिज कर दिया। हालांकि यह निचली अदालत का फैसला है और इसके खिलाफ उच्च अदालत में अपील की जा सकती है।
इस मामले में प्रशासन और सहकारिता विभाग की भूमिका भी चर्चा में रही है। पूर्व कलेक्टर मनीष सिंह के कार्यकाल में विवादित जमीन की रजिस्ट्री निरस्त कराने के लिए प्रशासनिक स्तर पर पहल की गई थी। सहकारिता विभाग के माध्यम से कोर्ट में आवेदन भी दिया गया था। हालांकि सुनवाई के दौरान प्रशासन और विभाग की ओर से प्रभावी पक्ष नहीं रखे जाने का मामला सामने आया। अब फैसले के बाद प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर भी नजर रहेगी।
अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ के सचिव एमके सिंह ने फैसले पर असंतोष जताते हुए हाईकोर्ट जाने की बात कही है। उनका दावा है कि जमीन की पहली रजिस्ट्री संस्था के नाम हुई थी और कंपनी ने गलत तरीके से जमीन हासिल कर दोहरी रजिस्ट्री कराई। संघ का कहना है कि विवादित जमीन पर सदस्यों को प्लॉट आवंटित किए जाने हैं। इन दावों पर अब उच्च अदालत में सुनवाई होने की स्थिति बन सकती है।
कलेक्टर शिवम वर्मा ने कहा है कि अभी अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त नहीं हुई है। आदेश मिलने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा और फिर आगे की कार्रवाई तय होगी। यदि कानूनी आधार बनता है तो ऊपरी अदालत में अपील के विकल्प पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल जिला कोर्ट के फैसले ने कंपनी के पक्ष को मजबूती दी है लेकिन रहवासी संघ की प्रस्तावित अपील और प्रशासन के अगले कदम से 350 करोड़ रुपये की इस जमीन का विवाद आगे भी कानूनी चर्चा में बना रह सकता है।
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