कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO के तहत आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि जरूरी दवाओं के लिए एक समान मूल्य निर्धारण मानदंड क्यों नहीं अपनाया जा सकता। अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों में दवाओं की बिक्री की व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। पीठ ने कहा कि मरीजों को अक्सर अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है। अदालत ने सरकारी योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों की दवाओं के खर्च को लेकर भी सवाल किया और कहा कि अंततः इसका बोझ करदाताओं पर पड़ता है।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा समाधान तलाशने की जरूरत है, जिसमें सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बना रहे। अदालत ने दवाओं की कीमतों में अंतर और आवश्यक दवाओं के मूल्य नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी रखी। कैंसर की दवा के PTR और MRP के बीच सामने आए भारी अंतर को लेकर अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों मौजूद है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
दूसरी ओर, केरल हाई कोर्ट ने भी सस्ती जीवनरक्षक कैंसर दवाओं की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार की शक्तियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने पेटेंट अधिनियम, 1970 का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार के पास जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण और आपूर्ति की व्यवस्था करने की शक्ति है। जरूरत पड़ने पर सरकार किसी कंपनी को दवा बनाने के लिए निर्देश दे सकती है। यह मामला महंगी कैंसर दवाओं को लेकर जून 2022 में दाखिल याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की सुनवाई पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो गई थी। अदालत ने कहा कि सरकार को सस्ती दवाओं की जरूरत, मरीजों की संख्या और सब्सिडी से होने वाले लाभ का आकलन करना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने तत्काल दवाओं का उत्पादन शुरू करने का आदेश नहीं दिया।
इन दोनों मामलों में कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत, दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और आम मरीजों के लिए सस्ती जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दवाओं के PTR और MRP के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठे हैं, जबकि केरल हाई कोर्ट ने सार्वजनिक हित में सरकार के पास मौजूद कानूनी शक्तियों पर टिप्पणी की है। दोनों सुनवाइयों में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था और मरीजों पर पड़ने वाले खर्च से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई है।
