राजस्थान के लोगों की आनुवंशिक जड़ें कितनी पुरानी? BHU की रिसर्च ने खोले राज, पाकिस्तान से ज्यादा उत्तर-मध्य भारत से मेल
शोधकर्ताओं ने करीब दो हजार असंबंधित और स्वस्थ लोगों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया। इनमें मीणा गुर्जर और राजस्थान की मिश्रित आबादी के लोग शामिल थे। वैज्ञानिकों ने डीएनए के 20 बहुरूपी ऑटोसोमल एसटीआर स्थानों का अध्ययन किया। इसके बाद इन आनुवंशिक आंकड़ों की तुलना पाकिस्तान के साथ ही भारत के अलग-अलग आबादी समूहों के उपलब्ध आंकड़ों से की गई। विभिन्न सांख्यिकीय तरीकों से किए गए विश्लेषण में राजस्थान के इन समूहों की आनुवंशिक समानता उत्तर और मध्य भारत की आबादियों के साथ अधिक दिखाई दी।
इस अध्ययन की खास बात यह है कि इससे पहले हुए कुछ शोधों में राजस्थान और वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र की आबादियों के बीच आनुवंशिक संबंधों के संकेत मिले थे। वर्ष 2005 में हुए एक अध्ययन में 669 लोगों के नमूनों के आधार पर मातृवंशीय डीएनए और वाई क्रोमोसोम जैसे आनुवंशिक संकेतकों का विश्लेषण किया गया था। उस अध्ययन में सिंधु घाटी और आसपास की आबादियों के बीच लंबे समय तक हुए जीन प्रवाह के संकेत बताए गए थे। नए अध्ययन में राजस्थान की आनुवंशिक तस्वीर को केवल पश्चिमी दिशा से जोड़कर देखने के बजाय उत्तर और मध्य भारत की आबादियों के साथ संबंधों को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टि से एमपी और गुजरात से आनुवंशिक समानता का अर्थ सीधा यह नहीं है कि राजस्थान के लोग इन राज्यों से आकर बसे हैं। डीएनए में मौजूद कुछ आनुवंशिक संकेत जब अलग-अलग आबादी समूहों में समान दिखाई देते हैं तो वैज्ञानिक उन आबादियों के बीच आनुवंशिक निकटता का अध्ययन करते हैं। इसके पीछे हजारों वर्षों में हुए आबादी के आवागमन मिश्रण और साझा पूर्वजों जैसी प्रक्रियाएं हो सकती हैं।
अध्ययन में राजस्थान मध्य प्रदेश गुजरात और महाराष्ट्र में रहने वाली भील आबादी के आनुवंशिक आंकड़ों पर भी चर्चा की गई है। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले भील समूहों के बीच साझा पुरानी आनुवंशिक विरासत के संकेत मिलने की बात कही गई है। शोध के अनुसार गुजरात के भीलों में आसपास की आबादियों के साथ मिश्रण अपेक्षाकृत कम जबकि राजस्थान के भीलों में आसपास के जातीय और जनजातीय समूहों के साथ अधिक आनुवंशिक विविधता दिखाई देती है।
प्रोफेसर चौबे के अनुसार राजस्थान की विभिन्न जातियों और जनजातियों के आनुवंशिक इतिहास में भी कई पीढ़ियों पीछे जाने पर साझा विरासत के संकेत दिखाई देते हैं। अध्ययन में करीब 52 हजार वर्ष पुराने मातृवंशीय डीएनए संकेतों का भी उल्लेख किया गया है। एम आर5 और यू2आई जैसे मातृवंशीय समूहों को दक्षिण एशिया में आधुनिक मानव के शुरुआती इतिहास से जोड़ा जाता है। इस तरह अध्ययन राजस्थान की आबादी को लंबे समय से चली आ रही स्थानीय आनुवंशिक निरंतरता और अलग-अलग दिशाओं से हुए आबादी के मिश्रण के व्यापक संदर्भ में देखने की बात करता है।
