भारत पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, जेलेंस्की ने अमेरिका के फैसले का किया खुलकर समर्थन
इस पूरे घटनाक्रम के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी कदम का समर्थन किया है। न्यूयॉर्क में अमेरिकी सांसदों से मुलाकात के दौरान जेलेंस्की ने रूस पर दबाव बढ़ाने वाले इस कानून को लेकर आभार जताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम युद्ध को खत्म करने और शांति तथा सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं। जेलेंस्की की प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब अमेरिका रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए अलग अलग आर्थिक उपायों पर जोर दे रहा है।
इस कानून का मुख्य निशाना रूस है। इसमें रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को मजबूत करने के साथ उसके ऊर्जा क्षेत्र और उससे जुड़े कारोबार पर दबाव बढ़ाने का प्रावधान है। कानून के तहत रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भी टैरिफ लगाया जा सकता है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर हस्ताक्षर किए। व्हाइट हाउस के अनुसार कानून रूस के खिलाफ वैधानिक प्रतिबंधों और टैरिफ संबंधी अधिकारों का विस्तार करता है।
भारत के लिए इस कानून का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि रूस लंबे समय से भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कई देशों से कच्चा तेल खरीदता है और रूस भी इसमें महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में भारत का रूस से तेल आयात करीब 16.5 फीसदी घटकर लगभग 21 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। इसके बावजूद रूस भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
अमेरिका का तर्क है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाकर मॉस्को पर यूक्रेन युद्ध को लेकर दबाव बनाया जा सकता है। वहीं भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही है। भारतीय पक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि ऐसे अमेरिकी कदमों का असर भारत अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि देश की ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए जाएंगे।
इस घटनाक्रम में अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अमेरिकी प्रशासन कानून में मिले अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह करता है। फिलहाल कानून लागू हो चुका है लेकिन भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाए जाने की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन के फैसले और भारत की प्रतिक्रिया पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। साथ ही इसका असर कच्चे तेल की कीमतों वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और भारत अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है।
