मरीज इलाज के लिए घर गहने बेचते हैं फिर दवा पर इतनी बड़ी कीमत क्यों सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों से पूछा सवाल
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ जरूरी कैंसर दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कैंसर के मरीज पहले ही बीमारी और इलाज के खर्च का सामना कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी दवाओं की कीमतों में इस तरह का अंतर बेहद गंभीर विषय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई परिवार इलाज का खर्च जुटाने के लिए अपनी संपत्ति और गहने तक बेच देते हैं। ऐसे हालात में दवाओं की कीमत में अत्यधिक बढ़ोतरी मरीजों और उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया जिनकी जिम्मेदारी दवाओं की कीमतों पर नजर रखने और अनुचित मूल्य वृद्धि के खिलाफ कार्रवाई करने की है। अदालत ने पूछा कि जब संबंधित अधिकारियों के पास दवाओं की कीमतों को लेकर निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी है तो फिर इस तरह का अंतर कैसे बना हुआ है। पीठ ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जाहिर की।
याचिका में केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जरूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दवा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं की ओर से आवश्यक दवाओं के लिए अत्यधिक कीमत वसूले जाने पर रोक लगनी चाहिए। उनका उद्देश्य यह है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को जरूरी दवाएं ऐसी कीमत पर उपलब्ध हों जिसे वे वहन कर सकें।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार इस मामले को केवल दो पक्षों के बीच सामान्य मुकदमेबाजी के तौर पर नहीं देख रही है। इससे संकेत मिलता है कि केंद्र भी मामले से जुड़े व्यापक पहलुओं पर विचार कर रहा है। अदालत ने दवाओं की कीमत तय करने और मरीजों को उचित कीमत पर दवा उपलब्ध कराने के मुद्दे को महत्वपूर्ण माना है।
मामले में जेनेरिक दवाओं का मुद्दा भी सामने आया। एक याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पंजीकृत चिकित्सा पेशेवरों द्वारा जेनेरिक दवाएं नहीं लिखे जाने की समस्या के कारण भी गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को परेशानी होती है। अगर समान चिकित्सकीय उपयोग वाली कम कीमत की दवाएं उपलब्ध हैं तो उनके इस्तेमाल को लेकर भी व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जरूरी दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और उचित मूल्य निर्धारण महत्वपूर्ण मुद्दा है। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक एजेंसियां दवाओं की कीमतों को लेकर क्या कदम उठाती हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है। उस सुनवाई में दवाओं की कीमतों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
