राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की 72 साल की कहानी, सत्यजीत रे के 36 सम्मान से शबाना आजमी के रिकॉर्ड तक
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत 1954 में हुई थी। उस समय 1953 में रिलीज हुई फिल्मों को सम्मान के लिए चुना गया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे और सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीवी केसकर थे। शुरुआत में इन पुरस्कारों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं, बल्कि स्टेट अवॉर्ड फॉर फिल्म के नाम से जाना जाता था।
इससे पहले 1949 में भारत सरकार ने फिल्म जांच समिति का गठन किया था। समिति का उद्देश्य भारतीय फिल्म उद्योग की स्थिति, फिल्मों की गुणवत्ता और उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव का अध्ययन करना था। समिति की सिफारिशों के बाद फिल्मों को सरकारी स्तर पर सम्मान देने की व्यवस्था शुरू की गई।
शुरुआती दौर में पुरस्कार मुख्य रूप से फीचर फिल्म, डॉक्यूमेंट्री और बच्चों की फिल्मों पर केंद्रित थे। उस समय कलाकारों के लिए अलग-अलग पुरस्कार नहीं दिए जाते थे। शुरुआत से ही अलग-अलग भारतीय भाषाओं की फिल्मों को इसमें जगह देने की नीति अपनाई गई। यही व्यवस्था आगे चलकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की प्रमुख विशेषता बनी।
पहला पुरस्कार समारोह 10 अक्टूबर 1954 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ था। सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मराठी फिल्म श्यामची आई को मिला था। सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म का पुरस्कार महाबलीपुरम को दिया गया। दो बीघा जमीन और भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य को भी ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया था। बच्चों की फिल्म खेला घर को भी सम्मान मिला था।
कलाकारों और तकनीशियनों के लिए अलग पुरस्कारों की शुरुआत 1967 में रिलीज फिल्मों के लिए हुई और 1968 में विजेताओं को सम्मानित किया गया। उत्तम कुमार पहले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बने, जबकि नरगिस दत्त पहली सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुनी गईं। उस समय इन पुरस्कारों को भारत अवॉर्ड और उर्वशी अवॉर्ड कहा जाता था।
1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शुरू हुआ और देविका रानी इसकी पहली प्राप्तकर्ता बनीं। 1973 से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के प्रशासन की जिम्मेदारी डायरेक्टरेट ऑफ फिल्म फेस्टिवल ने संभाली। 2022 में इसके पुनर्गठन के दौरान इसका राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम में विलय कर दिया गया।
समय के साथ पुरस्कारों का दायरा भी बढ़ता गया। सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, संगीत, प्लेबैक सिंगिंग, स्क्रीनप्ले, कॉस्ट्यूम, मेकअप, साउंड, कोरियोग्राफी, स्टंट और विजुअल इफेक्ट्स जैसे क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया।
अभिनय की श्रेणी में शबाना आजमी ने पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतकर रिकॉर्ड बनाया है। उन्हें अंकुर, अर्थ, खंडहर, पार और गॉडमदर के लिए सम्मान मिला। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में अमिताभ बच्चन ने चार पुरस्कार जीते हैं, जबकि ममूटी ने ब्रमायुगम के लिए अपना चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया।
प्लेबैक गायन में के. जे. येसुदास के नाम आठ राष्ट्रीय पुरस्कार हैं। संगीतकार ए. आर. रहमान ने सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते हैं। महान फिल्मकार सत्यजीत रे के नाम भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में 36 सम्मानों का उल्लेख किया जाता है। उनके योगदान ने भारतीय सिनेमा को देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग पहचान दिलाई।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का उद्देश्य केवल फिल्मों को सम्मान देना नहीं रहा है। इनका लक्ष्य कलात्मक और तकनीकी उत्कृष्टता वाली फिल्मों को प्रोत्साहित करना तथा भारत की विविध संस्कृतियों और भाषाओं को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना भी रहा है।
