यूपीआई एमडीआर शुल्क पर शरद पवार गुट के नेता जितेंद्र आव्हाड ने सरकार से शुल्क और आम लोगों पर असर स्पष्ट करने की मांग की
जितेंद्र आव्हाड का कहना है कि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में लोगों को डिजिटल पेमेंट अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। बड़ी संख्या में लोग अब रोजमर्रा के सामान और दूसरी जरूरतों के भुगतान के लिए यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में शुल्क लगाने की चर्चा को लेकर सरकार को अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए। उनका कहना है कि अगर व्यापारियों पर अतिरिक्त लागत आती है तो उसका असर सामान की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
आव्हाड ने उदाहरण देते हुए कहा कि दुकानदार जब सामान का बिल बनाएंगे और उनकी लागत बढ़ेगी तो उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है। ऐसे में आम उपभोक्ता को बढ़े हुए खर्च का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को अलग-अलग नामों से शुल्क की जानकारी देने के बजाय सीधे यह बताना चाहिए कि नई व्यवस्था में कितना पैसा लिया जाएगा और इसका असर किस पर पड़ेगा।
त्योहारों के दौरान सामान की कीमतों का जिक्र करते हुए आव्हाड ने दीवाली, नवरात्रि और गणेश उत्सव जैसे अवसरों का उदाहरण दिया। उन्होंने पेड़े की कीमत का भी उल्लेख किया और कहा कि लोगों को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि किसी वस्तु की कीमत बढ़ने के पीछे कौन-सा शुल्क या लागत जिम्मेदार है। उनका कहना था कि नाम बदलकर लोगों को भ्रमित करना उचित नहीं है और सरकार को शुल्क से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए।
मौजूदा व्यवस्था को लेकर सरकारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि एमडीआर सरकार की ओर से वसूला जाने वाला टैक्स नहीं है। प्रस्तावित ढांचे के अनुसार व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई लेनदेन पर शुल्क नहीं होगा। वहीं, निर्धारित शर्तों के तहत कुछ व्यापारी लेनदेन पर एमडीआर लागू होगा। सरकार ने यह भी कहा है कि छोटे व्यापारियों और आम उपयोगकर्ताओं पर अतिरिक्त बोझ सीमित रखने के लिए प्रावधान किए गए हैं।
आव्हाड ने यूपीआई शुल्क के अलावा मनोज जरांगे पाटील से जुड़े मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सरकार को मनोज जरांगे से बातचीत करनी चाहिए। उनके अनुसार बातचीत के माध्यम से इस मामले में आगे का रास्ता निकाला जा सकता है और संबंधित पक्षों के बीच संवाद जरूरी है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी को लेकर भी आव्हाड ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह केवल महाराष्ट्र तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि पूरे देश से जुड़ा मामला है। इस तरह यूपीआई एमडीआर, मनोज जरांगे के मुद्दे और यूसीसी को लेकर उन्होंने सरकार से स्पष्टता और बातचीत की जरूरत पर जोर दिया।
