60 साल से धरती को हरा-भरा करने में जुटे हैं झारखंड के ट्री मैन 65 लाख पौधों का रोपण कर कायम की मिसाल
डॉ. कौशल किशोर जायसवाल के अनुसार पर्यावरण के प्रति उनका जुड़ाव वर्ष 1966 में शुरू हुआ था। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1967 में अपनी 7.72 एकड़ निजी जमीन पर पौधारोपण करते हुए जंगल बचाव और जंगल लगाव अभियान को आगे बढ़ाया। धीरे धीरे यह अभियान उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मिशन बन गया। उन्होंने लोगों को केवल पौधे लगाने के लिए प्रेरित नहीं किया बल्कि लगाए गए पेड़ों की देखभाल और सुरक्षा को भी उतना ही जरूरी बताया। इसी सोच के साथ उन्होंने वनराखी मूवमेंट की शुरुआत की जिसमें पेड़ों को परिवार के सदस्य की तरह मानकर उनकी रक्षा करने का संदेश दिया जाता है।
उनका अभियान अब झारखंड तक सीमित नहीं है। भारत के 26 राज्यों के 181 जिलों के अलावा नेपाल भूटान म्यांमार सिंगापुर मलेशिया अजरबैजान थाईलैंड इंडोनेशिया जापान और वियतनाम जैसे देशों तक उनका पर्यावरण संदेश पहुंच चुका है। अलग अलग स्थानों पर उन्होंने निशुल्क पौधों का वितरण और रोपण किया है। उनके अभियान का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित धरती तैयार करना है।
डॉ. कौशल के अभियान की एक खास बात पेड़ों के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता है। वह पेड़ों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं बल्कि जीवनदाता मानते हैं। इसी सोच के कारण उन्होंने लाखों पौधों को लगाने के साथ उनकी रक्षा का संदेश भी दिया। उनके अभियान के तहत करीब 30 लाख पेड़ों को राखी बांधने की बात भी सामने आई है। इसके जरिए लोगों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि जिस तरह परिवार में भाई की रक्षा का संकल्प लिया जाता है उसी तरह पेड़ों की भी रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।
करीब 58 वर्षों से निशुल्क पौधा वितरण और रोपण का अभियान चलाने वाले डॉ. कौशल को उनके पर्यावरणीय योगदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें अब तक 65 प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलने की जानकारी दी गई है। हाल ही में झारखंड के राज्यपाल की ओर से भी उन्हें सम्मानित किया गया। उन्होंने देश के कई प्रसिद्ध पर्यावरणविदों के साथ काम किया है और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को लगातार आगे बढ़ाया है।
डॉ. कौशल का मानना है कि जंगलों की कटाई प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों के कारण प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। ऐसे समय में केवल सरकार या संस्थाओं के भरोसे पर्यावरण को सुरक्षित नहीं किया जा सकता। इसके लिए हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उनका जीवन इसी विचार का उदाहरण है कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक लगातार प्रयास करता रहे तो उसका छोटा सा कदम भी बड़े पर्यावरणीय आंदोलन में बदल सकता है। 65 लाख से अधिक पौधों के रोपण और वितरण की उनकी यात्रा आज हजारों लोगों को पेड़ लगाने और उन्हें बचाने की प्रेरणा दे रही है।
