September 9, 2026

बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम

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भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में पिछले ढाई महीने से बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने पूरे प्रदेश को चिंता में डाल दिया है। जून के आखिरी सप्ताह से बैहर और बिरसा ब्लॉक के कई बैगा और गोंड बहुल गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने का सिलसिला शुरू हुआ था जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बड़ा सवाल मौतों की संख्या को लेकर है। शुरुआत में प्रशासन की ओर से केवल 8 बच्चों की मौत की बात सामने आई लेकिन गांवों में पहुंची जमीनी पड़ताल और स्थानीय लोगों के दावों के बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया। अलग अलग रिपोर्टों में अब 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की बात सामने आ रही है जबकि प्रशासन की ओर से अभी तक मौतों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

सोनगुड्डा बोंदारी कुंडेकसा कोरका गठिया मछूलदा और मातला जैसे गांवों से बच्चों के बीमार होने और मौत की खबरें सामने आईं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं हुईं। अडोरी पंचायत के सरपंच ने तो अपनी पंचायत में ही 9 बच्चों की मौत का दावा किया है। दूसरी ओर सरकार की मेडिकल स्क्रीनिंग में बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई है। केंद्रीय टीम ने इलाके में 32433 लोगों की जांच की जिसमें 7711 बच्चे गंभीर कुपोषित पाए गए। इनमें 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करना पड़ा। वहीं 13406 बच्चे डायरिया से पीड़ित मिले जबकि 274 बच्चों में गंभीर निमोनिया के लक्षण पाए गए। जुलाई से अब तक 431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया जिनमें से 379 बच्चों को उपचार के बाद छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 52 बच्चे अब भी इलाजरत हैं।

इन मौतों के पीछे किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। कई बच्चों में मलेरिया डायरिया खसरा और चर्म रोग जैसी समस्याएं सामने आईं लेकिन लगभग सभी मामलों में कुपोषण एक बड़ी साझा समस्या बनकर उभरा। यही कुपोषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है और सामान्य दिखने वाली बीमारियों को भी गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का शरीर संक्रमण से मुकाबला नहीं कर पाता। जिंक विटामिन ए और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियां भी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

बालाघाट पहले से ही मलेरिया के लिहाज से संवेदनशील जिला रहा है। पिछले वर्ष प्रदेश में दर्ज 2126 मलेरिया मामलों में 685 मामले अकेले बालाघाट से सामने आए थे। इस वर्ष जुलाई तक प्रदेश में मिले 583 मामलों में भी 174 मामले बालाघाट के थे। इसके साथ ही बैगा समुदाय की बस्तियां जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में होने के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। साफ पानी की कमी और लंबे समय तक पोषण आहार नहीं मिलने की समस्या ने हालात को और गंभीर किया है।

सबसे चिंता की बात यह है कि इलाज के बाद घर लौटने वाले कुछ बच्चे दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों के पोषण और गांव के स्वास्थ्य वातावरण पर भी लगातार निगरानी जरूरी है। डायरिया होने पर तत्काल ओआरएस देना जिंक की खुराक पूरी करना और बच्चे की हालत बिगड़ने पर बिना देरी स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी बताया गया है।

मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। गलत आंकड़े बताए जाने के आरोपों के बाद तत्कालीन सीएमएचओ को हटाया गया। एक बच्चे की मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराए जाने के ग्रामीण आरोपों ने भी विवाद बढ़ाया। अस्पतालों में फोटो और मीडिया कवरेज पर रोक लगाने का आदेश जारी होने और कुछ ही घंटों में वापस लिए जाने से भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हुए।

सरकार ने स्थिति संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रभावित बैगा गांव पहुंचे और मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात कर आर्थिक सहायता की घोषणा की। जिला अस्पताल के बच्चों के वार्ड की क्षमता बढ़ाई गई है। छह मोबाइल मेडिकल यूनिट तैनात की गई हैं और निगरानी का दायरा बढ़ाया गया है। गांवों में सफाई अभियान और कीटनाशक छिड़काव भी कराया गया है।

इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि आखिर इन बच्चों की मौतों की वास्तविक संख्या कितनी है और बीमारी की जड़ क्या है। कुपोषण मलेरिया संक्रमण दूषित पानी और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था सभी एक साथ जिम्मेदार हैं या इसके पीछे कोई और कारण भी है यह स्पष्ट होना बाकी है। ऐसे में जरूरी है कि मौतों के आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए और हर प्रभावित गांव की स्वतंत्र जांच कराई जाए। क्योंकि बालाघाट की इन आदिवासी बस्तियों में सवाल सिर्फ बीमार बच्चों का नहीं बल्कि उन परिवारों के भरोसे का भी है जो अपने बच्चों को बचाने के लिए अब भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

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