मेडल से भरी झोली फिर भी नौकरी नहीं, थ्रोबॉल चैंपियन अमरदीप की कहानी ने CM सोरेन का खींचा ध्यान
अमरदीप ने कम उम्र से ही थ्रोबॉल को अपना करियर बनाया। कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया और लगातार शानदार प्रदर्शन किया। वर्ष 2015 में मलेशिया में आयोजित एशियन जूनियर थ्रोबॉल चैंपियनशिप में उन्होंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद वर्ष 2017 में काठमांडू में हुई इंडो नेपाल थ्रोबॉल चैंपियनशिप में भी वह स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे। वर्ष 2019 में बेंगलुरु में आयोजित साउथ एशियन थ्रोबॉल चैंपियनशिप में भी उन्होंने गोल्ड अपने नाम किया। वर्ष 2026 में रांची में आयोजित प्रतियोगिता में एक बार फिर अमरदीप ने स्वर्ण पदक हासिल किया। इस तरह उनके खाते में देश के लिए चार अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल हैं।
इतनी बड़ी खेल उपलब्धियों के बावजूद अमरदीप को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी। उनका कहना है कि वह वर्ष 2016 से प्रोत्साहन राशि के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। वहीं वर्ष 2020 से नौकरी के लिए कोशिश शुरू की थी लेकिन इसी दौरान कोरोना महामारी के कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई। वर्ष 2022 के बाद उन्होंने फिर लगातार प्रयास किए लेकिन अब तक उन्हें सफलता नहीं मिली। उनका दावा है कि नौकरी और कैश अवॉर्ड से जुड़े उनके आवेदन अभी भी लंबित हैं।
अमरदीप का कहना है कि उन्होंने अपनी समस्या सरकार के सामने रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह राज्य के पूर्व खेल मंत्री हफीजुल हसन से भी मुलाकात कर चुके हैं। उनका कहना है कि उनके कई साथी खिलाड़ी दूसरे राज्यों से हैं और वहां उन्हें सरकारी नौकरी सहित कई सुविधाएं मिली हैं। इसके मुकाबले झारखंड में उन्हें अब तक अपने आवेदन पर राहत का इंतजार है।
परिवार की आर्थिक स्थिति भी अमरदीप के संघर्ष को और मुश्किल बना देती है। उनके पिता सब्जी बेचकर परिवार का खर्च चलाते हैं और अमरदीप भी उनके काम में हाथ बंटाते हैं। उनकी मां गृहिणी हैं और वह करीब 35 किलो सब्जी सिर पर रखकर घर-घर बेचती हैं। बड़े भाई फास्ट फूड का स्टॉल चलाकर परिवार की आमदनी में सहयोग करते हैं। अमरदीप खुद भी जरूरत पड़ने पर कैब चलाते हैं। कई बार रात में कैब चलाने के बाद सुबह अभ्यास के लिए पहुंचना उनके लिए चुनौती बन जाता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए भी अमरदीप को आर्थिक परेशानियों से जूझना पड़ा। मलेशिया जाने के दौरान उन्हें करीब 65 हजार रुपये का कर्ज लेना पड़ा था। झारखंड थ्रोबॉल एसोसिएशन ने भी उनके खर्च में मदद की और करीब आधी राशि का भार उठाया। इसके बावजूद आर्थिक कठिनाइयों के बीच अमरदीप ने खेल से नाता नहीं तोड़ा है।
अब उनकी कहानी सामने आने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खेल विभाग को मामले को देखने और जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद खेल मंत्री सुदिव्य सोनू ने भी कहा कि सरकार मौजूदा खेल नीति के आधार पर अमरदीप को नौकरी देने की संभावनाएं तलाश रही है। साथ ही रोजगार के दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
अमरदीप का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। वह अक्टूबर 2026 के आखिर में श्रीलंका में होने वाली प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रहे हैं। एक ओर देश के लिए पदक जीतने का जुनून कायम है तो दूसरी ओर परिवार चलाने की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर है। अमरदीप की कहानी उन खिलाड़ियों की चुनौती को सामने लाती है जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के लिए पदक तो जीतते हैं लेकिन अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए उन्हें आज भी संघर्ष करना पड़ता है।
