अरेस्ट वारंट का डर दिखाया, फर्जी जज ने सुनाया संपत्ति जब्ती का फरमान; 96 दिन में बुजुर्ग दंपती से ठगे 22 लाख
पुलिस के अनुसार कृष्णा कॉम्प्लेक्स गणपति एन्क्लेव निवासी सुवर्णा लक्ष्मी और नरसिम्हा राव मूल रूप से आंध्र प्रदेश के पलनाडू जिले के रहने वाले हैं। परिवार के साथ फरवरी में शिवरात्रि मनाने के लिए वे आंध्र प्रदेश गए थे। इसी दौरान 19 मई को सुवर्णा के मोबाइल पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का अधिकारी खन्ना बताया और दावा किया कि उनके नाम गिरफ्तारी वारंट जारी है। उन्हें बताया गया कि दिल्ली केनरा बैंक से जुड़े एक खाते के जरिए नरेश गोयल के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करोड़ों रुपए का लेनदेन हुआ है और उसमें उनका नाम सामने आया है।
इसके बाद ठगों ने वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ शुरू कर दी। दंपती को निर्देश दिया गया कि वे किसी दूसरे व्यक्ति से संपर्क नहीं करेंगे और घर से बाहर भी नहीं निकलेंगे। 21 मई को एक महिला ने खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताते हुए बैंक खातों और दूसरी वित्तीय जानकारी मांगी। अगले दिन दंपती की वीडियो कॉल पर एक कथित जज से बात कराई गई। इस फर्जी जज ने उनके आधार कार्ड से जुड़ी जानकारी दिखाकर कार्रवाई का डर पैदा किया और उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वे गंभीर कानूनी मामले में फंस चुके हैं।
9 जून को कथित जज ने वीडियो कॉल पर दंपती को संपत्ति सीज करने की धमकी दी। इसके बाद निशा पटेल नाम की महिला ने उन्हें भोपाल लौटने के लिए कहा। ठगों ने मामले को खत्म करने के नाम पर एफडी और जेवर बेचने या गिरवी रखने का दबाव बनाया। डर के कारण दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से भोपाल के लिए रवाना हुए और 11 जून को यहां पहुंचे। अगले ही दिन उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपए जुटाए।
आरोपियों के निर्देश पर दंपती ने पांच अलग-अलग बार रकम विभिन्न बैंक खातों में जमा की। ठगों ने संपर्क बनाए रखने के लिए सात अलग-अलग WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल किया। इतनी बड़ी रकम देने के बाद भी दंपती को राहत नहीं मिली। उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया और किसी से बात नहीं करने का दबाव बनाया जाता रहा। यह सिलसिला 23 अगस्त तक चलता रहा। यानी 19 मई से 23 अगस्त तक करीब 96 दिनों तक बुजुर्ग दंपती साइबर ठगों के डर और दबाव में रहे।
बाद में दंपती को पूरे मामले पर संदेह हुआ और उन्होंने जब संबंधित जानकारी की जांच कराई तो पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के नाम पर दिखाया गया आदेश भी फर्जी था। इसके बाद उन्होंने साइबर सेल से संपर्क किया। 27 अगस्त को मामले में एफआईआर दर्ज की गई और केस डायरी कोलार थाने भेजी गई। पुलिस अब सातों WhatsApp नंबरों पांच बैंक खातों में हुए ट्रांजैक्शन वीडियो कॉल और आरोपियों की पहचान से जुड़े डिजिटल सुरागों की जांच कर रही है। यह मामला एक बार फिर बताता है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम पर डर पैदा कर पैसे मांगना साइबर ठगी का बड़ा तरीका बन चुका है। किसी भी जांच या गिरफ्तारी के नाम पर वीडियो कॉल के जरिए पैसे मांगने वालों पर भरोसा करने के बजाय तत्काल संबंधित पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना जरूरी है।
