सावन का चौथा सोमवार आज: शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं और क्या न करें, जानें पूजा विधि और व्रत के खास नियम
सावन सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। संभव हो तो घर के मंदिर में शिवलिंग स्थापित करके पूजा करें या किसी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव का दर्शन करें। शिवलिंग पर सबसे पहले स्वच्छ जल अर्पित करें। इसके बाद अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार दूध से अभिषेक किया जा सकता है। इसके बाद दोबारा जल अर्पित करें।
भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का विशेष महत्व बताया गया है। शिवलिंग पर साफ और साबुत बेलपत्र अर्पित करें। इसके साथ धतूरा और आक के फूल चढ़ाने की भी परंपरा है। भगवान शिव को सफेद फूल अर्पित किए जा सकते हैं। पूजा के दौरान चंदन लगाएं और धूप दीप जलाकर महादेव की आरती करें। इसके बाद भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें। ॐ नमः शिवाय का जाप सावन सोमवार के दिन विशेष रूप से किया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार शिव चालीसा और शिव स्तुति का पाठ भी कर सकते हैं।
सावन सोमवार के व्रत में खानपान का विशेष ध्यान रखा जाता है। कुछ भक्त पूरे दिन निराहार रहकर व्रत करते हैं जबकि कुछ लोग फलाहार करते हैं। फल दूध दही मखाना और व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थों का सेवन किया जा सकता है। व्रत हमेशा अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक भूखा रहने में परेशानी होती है तो वह अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार कर सकता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार सावन सोमवार के दिन केवल पूजा करना ही पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि मन और व्यवहार को भी सात्विक रखना चाहिए। इस दिन क्रोध विवाद और नकारात्मक विचारों से बचने की कोशिश करनी चाहिए। जरूरतमंदों की सहायता करना और अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भी शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान भगवान शिव से परिवार की सुख शांति और समृद्धि की कामना करें।
सावन के चौथे सोमवार पर भक्तों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और विश्वास है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होते हैं। इसलिए पूजा में दिखावे के बजाय मन की शुद्धता और भक्ति भावना को महत्व दें। ध्यान रखें कि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा और व्रत की परंपराएं अलग हो सकती हैं। इसलिए अपने कुलाचार और स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजा करना उचित रहेगा।
