बच्चों के पोषण पर संकट गहराया! प्रदेश के सभी 7 पोषण आहार प्लांट बंद, तय लक्ष्य से 130 दिन कम मिला आहार
स्थिति की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि प्रदेश में पोषण आहार तैयार करने वाले सभी 7 प्लांट बंद हो चुके हैं। रीवा सागर देवास शिवपुरी और होशंगाबाद समेत अलग-अलग जिलों में संचालित इन प्लांटों के बंद होने की वजह भारी आर्थिक घाटा बताया जा रहा है। नई व्यवस्था शुरू करने के लिए अभी तक टेंडर जारी नहीं होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में आंगनबाड़ियों तक नियमित पोषण आहार पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पोषण की स्थिति से जुड़े आंकड़े भी चिंता बढ़ा रहे हैं। एनएफएचएस-6 के आंकड़ों के मुताबिक देश के स्तर पर कुपोषण से जुड़े कई संकेतकों में सुधार दिखाई दिया है लेकिन मध्य प्रदेश में कुछ प्रमुख मानकों पर स्थिति कमजोर हुई है। प्रदेश में वेस्टिंग यानी बच्चे की लंबाई के अनुपात में कम वजन की स्थिति करीब 6 प्रतिशत बढ़ी है। अब लगभग हर चौथा बच्चा वेस्टिंग से प्रभावित बताया जा रहा है। स्टंटिंग यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले बच्चों के आंकड़े में करीब 2 प्रतिशत सुधार हुआ है लेकिन अब भी 33.3 प्रतिशत बच्चे इस स्थिति से प्रभावित हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और ज्यादा चिंताजनक बताई गई है। यहां अंडरवेट यानी उम्र के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों का आंकड़ा पिछले सर्वे में करीब 33 प्रतिशत था जो बढ़कर 42 प्रतिशत से अधिक हो गया है। इसका मतलब है कि ग्रामीण इलाकों में हर 10 बच्चों में 4 से ज्यादा बच्चे कम वजन की समस्या से जूझ रहे हैं। यह आंकड़ा पोषण व्यवस्था की प्रभावशीलता और आंगनबाड़ी सेवाओं की पहुंच को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पोषण से जुड़ी सरकारी योजनाओं के बीच महिलाओं के लाभ को लेकर भी एक अलग मुद्दा सामने आया है। बैगा भारिया और सहरिया जनजातियों की महिला मुखिया को आहार अनुदान योजना के तहत पहले 1000 रुपए और अब 1500 रुपए प्रतिमाह दिए जाते हैं। दूसरी ओर लाड़ली बहना योजना के नियमों के अनुसार दूसरी योजना से 1500 रुपए या उससे अधिक की राशि पाने वाली महिला पात्र नहीं होती। इसी वजह से इन जनजातीय समुदायों की 3 लाख से अधिक पात्र महिलाओं के लाड़ली बहना योजना से बाहर होने की बात कही गई है।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आहार अनुदान का उद्देश्य पोषण उपलब्ध कराना है जबकि लाड़ली बहना योजना महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता से जुड़ी है। उनका तर्क है कि दोनों योजनाओं का उद्देश्य अलग है इसलिए एक योजना का लाभ मिलने के आधार पर दूसरी योजना से महिलाओं को बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
मध्य प्रदेश में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की आबादी भी काफी बड़ी है। देश में 75 जनजातीय समूहों को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह के तौर पर चिन्हित किया गया है। मध्य प्रदेश में डिंडोरी मंडला बालाघाट अनूपपुर और उमरिया में बैगा समुदाय श्योपुर में सहरिया और छिंदवाड़ा के पातालकोट क्षेत्र में भारिया समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। देश में करीब 45 लाख विशेष रूप से कमजोर जनजातीय आबादी में लगभग 12 लाख लोगों के मध्य प्रदेश में होने का दावा किया गया है।
कुपोषण की जमीनी स्थिति दतिया से सामने आए एक मामले से भी समझी जा सकती है। सलैया पमार आदिवासी डेरा की 16 महीने की नीलू आदिवासी को उल्टी और दस्त के बाद 10 अगस्त को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसका वजन 5.2 किलो बताया गया जबकि इस उम्र में सामान्य वजन करीब 10 किलो के आसपास होना चाहिए। हालत में सुधार के बाद परिवार उसे घर ले गया लेकिन बाद में तबीयत बिगड़ने से बच्ची की मौत हो गई।
बताया गया कि गांव में छह अन्य बच्चे भी अतिकुपोषित हैं। बावजूद इसके बच्ची की मौत के बाद स्वास्थ्य टीम के समय पर गांव नहीं पहुंचने को लेकर सवाल उठे हैं। बीएमओ डॉ. राहुल चऊदा ने टीम भेजने की बात कही है जबकि कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने मामले की जांच कराने की बात कही है।
गांव की स्थिति में स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं की दूसरी कमियां भी सामने आई हैं। स्थानीय स्तर पर उपस्वास्थ्य केंद्र बंद मिला। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के अनुसार गांव में करीब 70 बच्चे हैं लेकिन पोषण ट्रैकर एप पर केवल 20 बच्चों का रिकॉर्ड दर्ज है। समग्र आईडी और आधार से जुड़ी दिक्कतों के कारण बाकी बच्चों को पोषण आहार नहीं मिलने की बात सामने आई है। गर्भवती महिलाओं को मिलने वाला टेक होम राशन भी करीब पांच महीने से नहीं पहुंचने का दावा किया गया है।
यह स्थिति बताती है कि कुपोषण से लड़ाई सिर्फ योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रह सकती। बच्चों और गर्भवती महिलाओं तक समय पर पोषण आहार पहुंचना स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना और पात्र हितग्राहियों का सही रिकॉर्ड तैयार करना भी उतना ही जरूरी है। जब पोषण आहार की निर्धारित अवधि 300 दिनों की हो और वितरण करीब 170 दिनों तक सीमित रह जाए तो व्यवस्था की निरंतरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे में बंद पड़े प्लांटों को लेकर जल्द निर्णय और आंगनबाड़ी स्तर पर नियमित पोषण व्यवस्था बहाल करना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।
