August 16, 2026

शरीर में बढ़ रही है पेट की चर्बी तो न करें नजरअंदाज, ब्लड शुगर बढ़ने के साथ बढ़ सकता है बीमारियों का जोखिम

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नई दिल्ली । आज की बदलती जीवनशैली में वजन बढ़ना और ब्लड शुगर का असंतुलन तेजी से चिंता का विषय बनता जा रहा है। लंबे समय तक बैठकर काम करना कम शारीरिक गतिविधि करना और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाला भोजन लेना शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने का कारण बन सकता है। खासतौर पर पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी को मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है। शोधों में पेट की चर्बी और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच संबंध भी सामने आया है। इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति सामान्य तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करतीं जिससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

जब शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा खर्च नहीं हो पाती है तो उसका कुछ हिस्सा फैट के रूप में जमा होने लगता है। लगातार वजन बढ़ना और खासकर कमर के आसपास चर्बी बढ़ना टाइप 2 डायबिटीज और दूसरी मेटाबॉलिक समस्याओं के जोखिम से जुड़ा पाया गया है। भारत में हुए अध्ययनों की समीक्षा में भी अधिक वजन और मोटापे को मेटाबॉलिक सिंड्रोम के ज्यादा जोखिम से जोड़ा गया है। इसलिए केवल वजन मशीन पर दिखने वाले आंकड़े पर ध्यान देने के बजाय कमर के आसपास बढ़ती चर्बी और पूरी जीवनशैली पर नजर रखना भी जरूरी है।

दूसरी ओर ब्लड शुगर शरीर के लिए ऊर्जा का जरूरी स्रोत है लेकिन इसका स्तर लंबे समय तक सामान्य सीमा से अधिक रहना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। टाइप 2 डायबिटीज में इंसुलिन का प्रभाव कम हो सकता है और समय के साथ शरीर के लिए ब्लड ग्लूकोज को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। लगातार हाई ब्लड शुगर रहने पर रक्त वाहिकाओं और नसों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है। डायबिटीज का लंबे समय तक खराब नियंत्रण हृदय रोग स्ट्रोक किडनी की बीमारी और आंखों से जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।

फैट और शुगर के इस संबंध को समझने के लिए इंसुलिन रेजिस्टेंस को समझना जरूरी है। जब शरीर में अतिरिक्त फैटी एसिड का बोझ बढ़ता है तो इसका असर मांसपेशियों लिवर और शरीर के दूसरे हिस्सों में ग्लूकोज के इस्तेमाल पर पड़ सकता है। इससे इंसुलिन सिग्नलिंग प्रभावित हो सकती है और ब्लड शुगर बढ़ने की स्थिति बन सकती है। हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता और आनुवंशिकता उम्र नींद तनाव खानपान और शारीरिक गतिविधि जैसे कई कारक भी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

इस जोखिम को कम करने के लिए सबसे पहले रोजमर्रा की गतिविधियों को बेहतर बनाना जरूरी है। नियमित तेज चाल से चलना साइकिल चलाना तैराकी या अपनी क्षमता के अनुसार दूसरी शारीरिक गतिविधियां की जा सकती हैं। वयस्कों के लिए सामान्य स्वास्थ्य लाभ के लिहाज से हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि और सप्ताह में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधि की सलाह दी जाती है।

खानपान में भी संतुलन जरूरी है। अत्यधिक मीठे पेय पदार्थों और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाले भोजन को सीमित करना और भोजन में सब्जियों दालों साबुत अनाज तथा पर्याप्त प्रोटीन जैसे पौष्टिक विकल्पों को शामिल करना मददगार हो सकता है। केवल किसी एक भोजन को छोड़ देने या लंबे समय तक भूखे रहने को हर व्यक्ति के लिए जरूरी उपाय नहीं माना जाना चाहिए। खासकर डायबिटीज गर्भावस्था या किसी अन्य बीमारी से जूझ रहे लोगों को डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन से सलाह लेनी चाहिए।

अगर वजन लगातार बढ़ रहा है कमर का घेरा बढ़ रहा है या बार बार ब्लड शुगर सामान्य से ज्यादा मिल रहा है तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर है। समय रहते वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और ब्लड शुगर पर ध्यान देने से मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि केवल सुबह खाली पेट 20 मिनट चलने या किसी एक खास डाइट से सभी लोगों में फैट और शुगर तेजी से कम होने की गारंटी नहीं होती। स्वास्थ्य संबंधी बदलाव व्यक्ति की स्थिति के अनुसार किए जाने चाहिए।

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