उत्तराखंड BJP का मिशन 2027, हारी हुई सीटों पर फोकस कहीं जीती हुई पर नुकसान न दे जाए
BJP मिशन 2027, जीत की कोशिश में कहीं मात न आ जाए हाथ
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अब अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी में हुई प्रदेश कोर ग्रुप की बैठक में संगठनात्मक गतिविधियों के साथ-साथ चुनावी प्रबंधन पर भी विस्तार से मंथन हुआ। बैठक का सबसे बड़ा फैसला उन 23 विधानसभा सीटों को लेकर सामने आया, जहां बीजेपी 2022 के चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सकी थी।
इस बार पार्टी ने केवल समीक्षा तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि हर कमजोर सीट के लिए वरिष्ठ नेताओं की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय कर दी है। मुख्यमंत्री, सांसद, मंत्री और संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों को अलग-अलग सीटों का प्रभारी बनाकर बीजेपी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब चुनावी प्रदर्शन की जवाबदेही भी तय होगी।
जमीनी स्थिति बताती है कि वर्तमान विधायक ही हैं खतरे में…
इससे इतर राजनीति के जानकारों के अनुसार भाजपा भले ही हर कमजोर सीट खासतौर से हारी हुई सीटों को लेकर इस बार विशेष सतर्क दिख रही है। और उसके लिए रणनीति भी बनाती दिख रही है। लेकिन जनता से किए वादे पूरे नहीं किए जाने से भाजपा के लिए असली परेशानी कमजोर व हारी हुई सीट से न होकर वर्तमान में जीती सीटों से होती दिख रही है। इनका तो यहां तक मानना है कि अभी भाजपा के लिए पहली आवश्यकता अपनी पुरानी सीटों को बचाए रखने की है।
23 सीटों पर सीधे वरिष्ठ नेताओं की जिम्मेदारी
दिल्ली में बनी रणनीति के तहत बीजेपी ने हार वाली प्रत्येक विधानसभा सीट पर अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है। इनमें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को खटीमा, सांसद अनिल बलूनी को बद्रीनाथ और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को पिरान कलियर विधानसभा की जिम्मेदारी दी गई है। बाकी 20 सीटों पर भी सांसदों, मंत्रियों और वरिष्ठ संगठन पदाधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि हर सीट पर लगातार फीडबैक, समीक्षा और संगठनात्मक सक्रियता बनी रहे।
दिल्ली की बैठक महज एक नियमित संगठनात्मक बैठक नहीं थी। इसमें 2027 विधानसभा चुनाव के लिए बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक की चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई। पहली बार पार्टी ने हार वाली सीटों के लिए अलग-अलग प्रभारी तय कर ‘माइक्रो मैनेजमेंट मॉडल’ अपनाने का फैसला किया है। इसके तहत प्रत्येक सीट का अलग राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड तैयार होगा और समय-समय पर उसकी समीक्षा भी की जाएगी।
जहां समस्या है वहां ध्यान ही नहीं
वही उत्तराखंड के चुनावों को लेकर हुए विभिन्न सर्वे को देखने व किसी निजी संस्था के सर्वे से जुड़े रहने वाले कुछ राजनीति के जानकारों का मानना है जमीनी हकीकत को देखे तो साफ हो जाता है कि उत्तराखंड में कमजोर रही या हारी सीटों को लेकर परेशानी कम हैं जबकि ऐसी कई सीटें हैं जहां के वर्तमान विधायकों से जनता असंतुष्ट है। ऐसी जगहों पर जनता एक सरल, विजन वाला नया युवा प्रत्याशी चाहती है। जनता का खुद यह मानना है कि एक ओर जहां इनमें से किसी विधायकों के बयानों ने लोगों की दिल पर चोट पहुंचाई हैं। जबकि किसी के बयान परिवारवाद के रूप में भी जनता के सामने आ चुके हैं। वहीं किसी ने क्षेत्र में कोई तरक्की (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का कार्य ही नहीं किया। वहीं पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार ऐसे में जनता के विरोध के बावजूद कुछ जगहों पर पुराने व वर्तमान विधायकों के हाथों में ही संगठन की चाबी होने से वे अपना ही नाम आगे बढवाते दिख रहे हैं। जिसका पार्टी को 2027 में बड़ा खामियाजा चुकाना पड़ सकता है।
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साल 2022 में कई सीटों पर हार से लिया सबक…
वहीं बीजेपी के भीतर हुए आंतरिक विश्लेषण में माना गया कि साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर स्थानीय असंतोष, टिकट वितरण को लेकर नाराजगी और संगठनात्मक कमजोरियां हार का कारण बनी थीं। इस बार पार्टी इन कमियों को पहले ही दूर करने की रणनीति पर काम कर रही है। जिम्मेदारी तय होने से स्थानीय संगठन और प्रभारी नेताओं दोनों की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।
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दिल्ली बैठक से निकले 5 बड़े राजनीतिक संकेत
1. अब रक्षात्मक नहीं, आक्रामक रणनीति
बीजेपी ने स्पष्ट कर दिया है कि 2027 का चुनाव केवल सरकार की उपलब्धियों के आधार पर नहीं लड़ा जाएगा। संगठन समानांतर रूप से हर विधानसभा क्षेत्र में चुनावी तैयारी करेगा।
2. हर कमजोर सीट का अलग प्रभारी
पहली बार 2022 में हारी गई 23 सीटों के लिए अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी देकर पार्टी ने सीट आधारित रणनीति अपनाई है।
3. नियमित समीक्षा और रिपोर्ट कार्ड
हर प्रभारी नेता को अपनी सीट की राजनीतिक स्थिति, संगठन की मजबूती, स्थानीय मुद्दों और जनसंपर्क गतिविधियों की नियमित रिपोर्ट पार्टी नेतृत्व को देनी होगी।
4. सरकार और संगठन में बेहतर तालमेल
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सरकार और संगठन के बीच समन्वय और मजबूत किया जाए, ताकि सरकारी योजनाओं और संगठनात्मक गतिविधियों का लाभ सीधे मतदाताओं तक पहुंचे।
5. युवाओं और बूथ संगठन पर फोकस
आगामी महीनों में बूथ सशक्तिकरण अभियान, शक्ति केंद्र बैठकों, तिरंगा यात्रा और हर घर तिरंगा जैसे कार्यक्रमों के जरिए कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने और नए मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति पर भी सहमति बनी।
डेढ़ साल पहले ही हारी सीटों पर शुरू किया था फोकस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी ने चुनाव से लगभग डेढ़ साल पहले ही जिन सीटों पर पिछली बार कमजोर रही थी, वहां विशेष फोकस शुरू कर दिया है। इससे पार्टी को स्थानीय मुद्दों की पहचान, असंतोष दूर करने और संगठन को मजबूत करने का पर्याप्त समय मिलेगा।
हालांकि केवल प्रभारी नियुक्त कर देने से चुनावी सफलता की गारंटी नहीं मानी जा सकती। अंतिम नतीजे कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करेंगे, जिनमें सरकार का प्रदर्शन, स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, विपक्ष की रणनीति, क्षेत्रीय मुद्दे और मतदान के समय का राजनीतिक माहौल शामिल होगा।
फिलहाल इतना जरूर माना जा रहा है कि बीजेपी ने 2027 के चुनाव के लिए ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ को अपनी केंद्रीय रणनीति बना लिया है। यदि पार्टी 23 कमजोर सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल रहती है, तो लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की उसकी संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। वहीं यदि इन सीटों पर अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, तो यही विधानसभा क्षेत्र चुनाव परिणाम की दिशा भी तय कर सकते हैं।
