August 14, 2026

संसद के मानसून सत्र में विपक्षी एकजुटता और छात्र आंदोलनों के कारण बैकफुट पर आई एनडीए सरकार।

0
8-1786696989
नई दिल्ली । संसद के हाल ही में संपन्न हुए मानसून सत्र के दौरान देश की राजनीतिक फिजां में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सत्र की शुरुआत से पहले जहां सत्तारूढ़ गठबंधन मजबूत स्थिति में नजर आ रहा था, वहीं सत्र के दौरान हुए घटनाक्रमों और छात्र आंदोलनों के कारण विपक्षी दल सरकार पर रणनीतिक दबाव बनाने में पूरी तरह सफल रहे।

मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले राजनीतिक समीकरण एनडीए के पक्ष में दिखाई दे रहे थे। विभिन्न राज्यों के राजनीतिक घटनाक्रमों से विपक्षी दल मनोवैज्ञानिक दबाव महसूस कर रहे थे। हालांकि, सत्र के दौरान देश के कई हिस्सों में शुरू हुए छात्र आंदोलनों, पेपर लीक विवादों और पुलिस कार्रवाई के मुद्दों ने पूरे परिदृश्य को बदलकर रख दिया।

संसद भवन के भीतर और बाहर कांग्रेस की अगुवाई में एकजुट हुए विपक्षी दलों ने इन संवेदनशील मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। सरकार के खिलाफ बने इस माहौल को बांकीपुर और दतिया उप-चुनावों में सत्तारूढ़ दल को मिली शिकस्त ने और अधिक बल दिया। इन चुनावी नतीजों से विपक्षी सांसदों का उत्साह और आक्रामकता दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

विपक्ष के कड़े तेवरों और लगातार जारी हंगामे के कारण सरकार को कई महत्वपूर्ण विधायी प्रस्तावों पर अपने कदम पीछे खींचने पड़े। एफसीआरए संशोधन विधेयक को आगे की समीक्षा के लिए संसद की स्थायी समिति के पास भेजने का निर्णय लिया गया। इसके अलावा महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े विधेयकों पर भी विस्तृत चर्चा संभव नहीं हो सकी।

सत्र के दौरान विभिन्न क्षेत्रीय दलों के बीच अभूतपूर्व समन्वय देखने को मिला। तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने अलग-अलग मुद्दों पर एक-दूसरे का पुरजोर समर्थन किया। नीट परीक्षा में अनियमितताओं और छात्रों पर हुई कार्रवाई के मुद्दे पर पूरा विपक्ष एक सुर में गृह मंत्री से जवाब मांगने पर अड़ा रहा, जिससे सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई।

संसदीय गतिरोध का असर देश के विभिन्न राज्यों की राजनीति पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। मध्य प्रदेश के दतिया उप-चुनाव में आए नतीजों और राज्य के युवाओं से जुड़े रोजगार व परीक्षा संबंधी मुद्दों को लेकर स्थानीय स्तर पर भी राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। मध्य प्रदेश में भी छात्र संगठनों द्वारा इन मुद्दों को लेकर लगातार संवाद और प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

मानसून सत्र के दौरान नीट परीक्षा विवाद, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक और जनहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा अधूरी रह गई। लगातार होते स्थगन के कारण विभिन्न क्षेत्रों के सांसदों द्वारा उठाए जाने वाले शून्यकाल के मुद्दे भी सदन के पटल पर प्रस्तुत नहीं किए जा सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मानसून सत्र में जिस तरह से विपक्षी दलों ने एकजुटता दिखाई है, उससे आने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है। छात्र आंदोलनों और जनहित के मुद्दों को आगे भी बरकरार रखना विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती सिद्ध होगा।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *