August 8, 2026

उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे मामले में सात छात्रों को जमानत, दो पर कोर्ट की सख्ती

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नई दिल्ली ।
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस से जुड़े एक मामले में मुंबई की अदालत ने नौ आरोपी छात्रों में से सात को अग्रिम जमानत दे दी, जबकि दो छात्रों की याचिकाएं खारिज कर दी गईं। मामला पिछले वर्ष संस्थान परिसर में हुई एक सभा के दौरान कथित तौर पर उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में नारे लगाए जाने से जुड़ा है।

मुंबई सेशंस कोर्ट के न्यायाधीश वीबी बोहरा ने दो छात्रों को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि छात्र होने के नाते आरोपियों से देश के कानून का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है। जिन दो छात्रों की याचिकाएं खारिज हुई हैं, उनमें एक 32 वर्षीय गोवंडी निवासी और दूसरा 23 वर्षीय देवनार निवासी बताया गया है।

मामला 12 अक्टूबर 2025 को TISS में आयोजित एक सभा से जुड़ा है। यह कार्यक्रम दिवंगत पूर्व प्रोफेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित किया गया था। सभा के दौरान छात्रों ने उनकी तस्वीर लगाई, मोमबत्तियां जलाईं और उनकी कविताएं पढ़ीं। कुछ प्लेकार्ड पर रेस्ट इन पावर जैसे संदेश भी लिखे थे।

अदालत ने माना कि जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देना अपने आप में कोई गैरकानूनी गतिविधि नहीं है। विशेष रूप से अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि उन्हें 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी थी। हालांकि, अदालत के अनुसार सभा के दौरान कथित तौर पर लगाए गए कुछ नारे इसे केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखते।

जांच एजेंसियों के अनुसार, सभा में करीब 10 से 12 छात्र शामिल हुए थे और आरोप है कि वहां उमर खालिद तथा शरजील इमाम की रिहाई की मांग को लेकर नारे लगाए गए। पुलिस के अनुसार, इस सभा के लिए संस्थान प्रशासन से पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। शुरुआती प्राथमिकी में नौ लोगों के नाम दर्ज किए गए थे और बाद में जांच ट्रॉम्बे पुलिस से अपराध जांच विभाग को सौंप दी गई।

मामले की जांच के दौरान कुछ आरोपियों के लैपटॉप और मोबाइल फोन भी जब्त किए गए। अभियोजन पक्ष का दावा है कि इन उपकरणों में माओवादी संगठनों से संबंधित किताबें और अन्य सामग्री मिली। जांचकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ डिजिटल जानकारी हटाई गई थी।

अदालत ने जांच में मिली सामग्री के आधार पर कहा कि आरोपियों में से कुछ के माओवादी विचारधारा से प्रभावित होने के संकेत मिलते हैं। अदालत ने यह संभावना भी जताई कि सभा के जरिए संस्थान के अन्य छात्रों को प्रभावित करने का प्रयास किया गया हो सकता है। हालांकि, न्यायाधीश ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि केवल माओवादी संगठनों का साहित्य डाउनलोड करना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि कैंपस में बिना अनुमति रेस्ट इन पावर जैसे शब्दों का इस्तेमाल अकेले कोई अपराध नहीं है। लेकिन कथित नारे, सभा की परिस्थितियां और जांच के दौरान सामने आई सामग्री को एक साथ देखने पर आरोपियों के कथित इरादों की जांच जरूरी हो जाती है।

जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आपराधिक कार्रवाई में हुई देरी का मुद्दा भी उठाया गया। अदालत ने कहा कि मुकदमों में देरी के पीछे कई प्रशासनिक और न्यायिक कारण हो सकते हैं, जिनमें लंबित मामलों की संख्या और न्यायाधीशों की उपलब्धता शामिल है। न्यायाधीश ने कहा कि इन अर्जियों पर भी दाखिल होने के नौ महीने से अधिक समय बाद आदेश दिया जा रहा है।

फिलहाल मामले की जांच जारी है। सात छात्रों को अग्रिम जमानत मिलने से उन्हें अंतरिम कानूनी राहत मिली है, जबकि दो छात्रों को अदालत से यह संरक्षण नहीं मिला। आगे की कार्रवाई जांच में सामने आने वाले तथ्यों और मामले की न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर तय होगी।

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