भारतीय मुक्केबाजों का गोल्डन पंच, अंकुश पंघाल बोले- विश्वास नहीं खोया, इसलिए मिली जीत
फाइनल मुकाबले के बाद अंकुश पंघाल ने कहा कि शुरुआत उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रही। पहले बाउट में वह 0-5 से पीछे हो गए थे, जिससे उन पर काफी दबाव बन गया था। हालांकि उन्होंने घबराने के बजाय अपने खेल और खुद की क्षमता पर भरोसा बनाए रखा। यही आत्मविश्वास अंत तक उनके साथ रहा और आखिरकार उन्होंने मुकाबला पलटते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। अंकुश ने कहा कि परिवार और कोच का विश्वास हमेशा उनके साथ रहा और यही वजह है कि वह दबाव के बावजूद अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके। उन्होंने अपना स्वर्ण पदक अपने परिवार और कोच को समर्पित किया तथा कहा कि अब उनका अगला लक्ष्य एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक जीतना है।
महिला मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन को फाइनल में हार का सामना करना पड़ा और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा। मुकाबले के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि स्वर्ण पदक नहीं जीत पाने का थोड़ा अफसोस जरूर है लेकिन टीम इंडिया के शानदार प्रदर्शन ने उनकी खुशी बढ़ा दी। उन्होंने कहा कि यह उनका पहला कॉमनवेल्थ गेम्स पदक है और इसलिए इसकी अहमियत उनके लिए बेहद खास है। लवलीना ने कहा कि अब वह एशियाई खेलों की तैयारी में पूरी ताकत झोंकेंगी और वहां स्वर्ण पदक जीतने की कोशिश करेंगी। उन्होंने अपना यह पदक असम में बाढ़ से प्रभावित लोगों को समर्पित करते हुए उनके जल्द सामान्य जीवन में लौटने की कामना भी की।
पुरुषों की 90 प्लस किलोग्राम स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाले नरेंद्र ने भी अपने प्रदर्शन का ईमानदारी से आकलन किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने मुकाबले में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की लेकिन विरोधी मुक्केबाज की रणनीति उनके अनुमान से अलग थी। उनके अनुसार प्रतिद्वंद्वी लगातार मूवमेंट करता रहा जिससे उसे प्रभावी ढंग से पकड़ पाना मुश्किल साबित हुआ। नरेंद्र ने कहा कि वह अपनी कमियों पर काम करेंगे और एशियाई खेलों में इस हार की भरपाई करने का प्रयास करेंगे।
स्वर्ण पदक विजेता सचिन सिवाच ने भी अपने फाइनल मुकाबले की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि शुरुआती दो राउंड में वह 2-3 से पीछे थे और उनके पास आखिरी राउंड में सब कुछ दांव पर लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसी सोच के साथ उन्होंने लगातार आक्रामक अंदाज अपनाया और विरोधी पर दबाव बनाया। सचिन ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि वह मुकाबला पलट सकते हैं और आखिरकार उनका विश्वास सही साबित हुआ। उनके अनुसार खेल में तकनीक जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी मानसिक मजबूती और जीत का विश्वास भी होता है।
भारतीय मुक्केबाजों का यह प्रदर्शन केवल पदकों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उसने यह भी दिखाया कि मेहनत, आत्मविश्वास और मजबूत मानसिकता के दम पर किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। अब सभी खिलाड़ियों की नजरें एशियाई खेलों और आने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर हैं, जहां वे इसी शानदार लय को बरकरार रखते हुए भारत के लिए और अधिक पदक जीतने का लक्ष्य लेकर उतरेंगे।
