पद्मश्री प्रख्यात साहित्यकार कैलाश चंद्र पंत पंचतत्व में विलीन, भोपाल के भदभदा घाट पर हुआ अंतिम संस्कार
परिवार की ओर से उनके छोटे भाई चंद्रशेखर पंत ने उनके निधन की जानकारी देते हुए बताया कि कैलाश चंद्र पंत ‘दादा’ ने अंतिम सांस अपने भोपाल स्थित निवास पर ली। उन्होंने बताया कि अंतिम संस्कार शनिवार को भदभदा विश्राम घाट पर संपन्न हुआ।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पंत के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सहित अनेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य की उल्लेखनीय सेवा की। उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
उत्तराखंड से था पैतृक संबंध
कैलाश चंद्र पंत का पैतृक गांव उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का खंतोली था। उनका जन्म 26 अप्रैल 1936 को मध्य प्रदेश के महू (इंदौर) में हुआ था। उनके पिता लीलाधर पंत और माता हरिप्रिया पंत रोजगार के सिलसिले में मध्य प्रदेश में आकर बस गए थे।
उन्होंने अपने शैक्षणिक और साहित्यिक जीवन में इंदौर स्थित यूनियन थियोलॉजिकल सेमिनरी में व्याख्याता तथा भोपाल के पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र में प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं। इसके अलावा वे ‘शिक्षा प्रदीप’, ‘जनधर्म’ और ‘दूरगामी आह्वान’ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े रहे।
इसी वर्ष मिला था पद्मश्री सम्मान
हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2026 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। वे हिंदी भवन, भोपाल के संचालक रहे और भारत कृषक समाज, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति तथा मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति जैसी संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
उनकी चर्चित कृतियों में ‘कौन किसका आदमी’, ‘धुंध के आर-पार’, ‘शब्द का विचार-पथ’ और ‘शैलेश मटियानी: सृजन यात्रा’ शामिल हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें साहित्य भूषण सम्मान, निराला साहित्य सम्मान, साहित्य शिरोमणि सम्मान और संस्कृति गौरव सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था।
