July 28, 2026

राफेल सौदे पर तकनीकी अड़चनें बरकरार, सोर्स कोड और रडार तकनीक साझा करने पर फ्रांस अब भी सतर्क

0
33-1785236768
नई दिल्ली । भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत होता रहा है, लेकिन राफेल लड़ाकू विमान से जुड़ी उन्नत तकनीकों के हस्तांतरण का मुद्दा अब भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। भारतीय वायुसेना के लिए 114 बहुउद्देश्यीय राफेल लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है, हालांकि विमान के सोर्स कोड और रडार से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों के विषय पर सहमति बनने में अभी समय लग सकता है।

भारत लंबे समय से ऐसी तकनीकी पहुंच चाहता है, जिससे भविष्य में राफेल विमानों में स्वदेशी हथियारों और नई प्रणालियों का एकीकरण स्वतंत्र रूप से किया जा सके। इसी उद्देश्य से रक्षा मंत्रालय विमान के इंटरफेस डेटा और आवश्यक तकनीकी जानकारी प्राप्त करने पर जोर दे रहा है। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को घरेलू तकनीक के साथ राफेल प्लेटफॉर्म को बेहतर ढंग से अनुकूलित करने में मदद मिल सकती है।

जानकारी के अनुसार, भारत ने इस वर्ष मई में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए औपचारिक अनुरोध भेजा था। अब फ्रांस की ओर से उसके जवाब का इंतजार किया जा रहा है। जवाब मिलने के बाद दोनों पक्ष कीमत, तकनीकी सहयोग, उत्पादन व्यवस्था और अन्य व्यावसायिक शर्तों पर विस्तृत चर्चा करेंगे। प्रस्तावित समझौते में देश के भीतर बड़े पैमाने पर विनिर्माण को भी प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे रक्षा उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सके।

बताया जा रहा है कि प्रस्तावित परियोजना में अधिकांश निर्माण कार्य भारत में ही किए जाने की योजना है। इसके तहत स्थानीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यह पहल रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को गति देने और आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय उद्योग को जोड़ने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

हालांकि तकनीकी स्तर पर दो प्रमुख चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। पहली चुनौती राफेल में इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक एईएसए रडार से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों की है। इन अधिकारों के कारण भारत को रडार प्रणाली में स्वतंत्र बदलाव या नई क्षमताओं के समावेश में सीमाएं आ सकती हैं। दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण चुनौती विमान के सोर्स कोड तक पहुंच की है, जिसे फ्रांस अत्यंत संवेदनशील रणनीतिक तकनीक मानता है।

राफेल का सोर्स कोड विमान के मिशन कंप्यूटर, सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और कई महत्वपूर्ण डिजिटल प्रणालियों का आधार माना जाता है। यही कारण है कि इस तकनीक को फ्रांस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण संपत्ति के रूप में देखता है और इसके पूर्ण हस्तांतरण को लेकर सावधानी बरत रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर की तकनीक साझा करने का निर्णय केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं से भी जुड़ा होता है।

भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में अस्त्र जैसी स्वदेशी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, रुद्रम जैसी एंटी-रेडिएशन मिसाइलों तथा अन्य घरेलू हथियार प्रणालियों को राफेल में आसानी से एकीकृत करने की आवश्यकता होगी। यदि आवश्यक तकनीकी पहुंच उपलब्ध नहीं होती है तो प्रत्येक बड़े उन्नयन या एकीकरण के लिए मूल निर्माता पर निर्भरता बनी रह सकती है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को देखते हुए बातचीत आगे बढ़ने की संभावना बनी हुई है। आने वाले दौर की वार्ताओं में तकनीकी सहयोग, उत्पादन साझेदारी और संचालन संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा। यदि इन मुद्दों पर सहमति बनती है तो यह समझौता भारतीय वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी नई दिशा दे सकता है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *