July 24, 2026

मिडिल ईस्ट तनाव से तेल बाजार में हड़कंप 100 डॉलर की ओर बढ़ता क्रूड भारत के लिए क्यों बना चिंता का कारण

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नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते भू राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल दर्ज किया जा रहा है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा रेड सी क्षेत्र में तेल टैंकरों पर बढ़ते हमलों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है और विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगातार मजबूत बना हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका के चलते निवेशक तेजी से खरीदारी कर रहे हैं। कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने भी चेतावनी दी है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

तेल की कीमतों में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ता तनाव माना जा रहा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसके अलावा रेड सी में जहाजों पर बढ़ते हमलों ने भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल परिवहन को प्रभावित किया है जिससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।

भारत के लिए यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर आयात बिल पर पड़ता है। यदि लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा बना रहता है तो सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है और पेट्रोल तथा डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना भी मजबूत हो जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चा तेल 95 से 120 डॉलर प्रति बैरल के बीच लंबे समय तक बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल के दाम में प्रति लीटर पांच से आठ रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे केवल वाहन चालकों की जेब पर असर नहीं पड़ेगा बल्कि माल ढुलाई की लागत बढ़ने से फल सब्जियां दूध अनाज और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। इसका असर खुदरा महंगाई पर भी देखने को मिल सकता है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल अंतरराष्ट्रीय हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं तो आने वाले दिनों में आम लोगों को ईंधन और रोजमर्रा की वस्तुओं पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है।

फिलहाल बाजार की नजर मिडिल ईस्ट की स्थिति और वैश्विक तेल आपूर्ति पर टिकी हुई है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या फिर नया रिकॉर्ड बनाती हैं।

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