July 23, 2026

डॉक्टरों पर बढ़ते हमलों ने बढ़ाई चिंता WHO ने कहा हेल्थकेयर वर्कर्स की सुरक्षा के बिना मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था संभव नहीं

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नई दिल्ली । दुनिया भर में मरीजों की जान बचाने के लिए दिन रात काम करने वाले डॉक्टर नर्स और अन्य हेल्थकेयर वर्कर्स अब खुद असुरक्षा के माहौल में काम करने को मजबूर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में इस स्थिति को गंभीर वैश्विक चिंता का विषय बताते हुए कहा है कि स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार हर 10 में से लगभग 4 हेल्थकेयर वर्कर्स अपने पेशेवर जीवन में कम से कम एक बार शारीरिक हिंसा का शिकार होते हैं जबकि गाली गलौज धमकी और अभद्र व्यवहार जैसी घटनाओं को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा 60 प्रतिशत से भी अधिक पहुंच जाता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों को कई बार मरीजों और उनके परिजनों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। इलाज में देरी भीड़ अधिक होने संसाधनों की कमी और अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने जैसी परिस्थितियां कई बार तनाव को हिंसा में बदल देती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है बल्कि विकसित देशों में भी तेजी से बढ़ रही है।

एक अंतरराष्ट्रीय मेडिकल अध्ययन के अनुसार डॉक्टरों और हेल्थकेयर वर्कर्स के खिलाफ हिंसा के सबसे अधिक मामले जर्मनी में दर्ज किए गए हैं जहां लगभग 91 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने किसी न किसी प्रकार की हिंसा का अनुभव बताया। इसके बाद चीन पेरू तुर्की और भारत का स्थान आता है। भारत में भी डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों पर हमलों की घटनाएं समय समय पर सामने आती रही हैं जिससे स्वास्थ्य क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टरों पर बढ़ते हमलों के पीछे कई कारण हैं। अस्पतालों में मरीजों की अत्यधिक संख्या स्वास्थ्यकर्मियों की कमी लंबा इंतजार संवाद की कमी और इलाज से जुड़ी अवास्तविक अपेक्षाएं अक्सर विवाद की वजह बनती हैं। कई बार मरीज के परिजन भावनात्मक दबाव में आकर स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार या हिंसा कर बैठते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि समाज में धैर्य की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है।

भारत में स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा के लिए कई राज्यों ने अलग अलग कानून बनाए हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे देश में एक समान और सख्त राष्ट्रीय कानून की आवश्यकता है। उनका कहना है कि केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है ताकि डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी बिना भय के अपना कर्तव्य निभा सकें।

दुनिया के कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। स्पेन ने डॉक्टरों पर हमले को राज्य के खिलाफ अपराध की श्रेणी में रखा जिसके बाद हिंसा की घटनाओं में कमी दर्ज की गई। सिंगापुर में स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करने पर भारी जुर्माने और जेल का प्रावधान है जबकि यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका के कई हिस्सों में भी ऐसे मामलों में कड़े कानूनी प्रावधान लागू किए गए हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि सुरक्षित स्वास्थ्यकर्मी ही सुरक्षित स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव होते हैं। यदि डॉक्टर नर्स और अन्य चिकित्सा कर्मी भय और असुरक्षा के माहौल में काम करेंगे तो इसका सीधा असर मरीजों की देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा। इसलिए सरकारों समाज और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहां स्वास्थ्यकर्मियों का सम्मान और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हो सकें।

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