July 24, 2026

ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने की पहल तेज, हंस आजीविका परियोजना में 10 गांव शामिल, स्वरोजगार को मिलेगा नया विस्तार

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नई दिल्ली ।  ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से द हंस फाउंडेशन की ओर से संचालित हंस आजीविका परियोजना के तहत चित्रकूट विकासखंड की 10 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया है। परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विकासखंड पहाड़ी परिसर में एक दिवसीय समन्वय कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न विभागों के अधिकारियों, स्वयं सहायता समूहों की महिला सदस्यों और ग्रामीण प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आजीविका के नए अवसरों से जोड़ना, स्वयं सहायता समूहों को मजबूत बनाना तथा ग्राम स्तर पर रोजगार और आय के स्थायी स्रोत विकसित करने के प्रति जागरूक करना रहा। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर आत्मनिर्भर बनने और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए प्रेरित किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बीडीओ संजय कुमार पांडेय और सहायक विकास अधिकारी पंचायत भूपेंद्र द्विवेदी ने ग्रामीण विकास में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि संगठित प्रयासों के माध्यम से महिलाएं न केवल अपनी आय बढ़ा सकती हैं, बल्कि परिवार और समाज के आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। अधिकारियों ने महिलाओं से सरकारी योजनाओं का अधिकतम लाभ लेने और स्वरोजगार गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करने का आह्वान किया।

द हंस फाउंडेशन के सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर संतोष कुमार मिश्रा ने संस्था की विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में लगातार कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के उद्देश्य से विकासखंड पहाड़ी की 10 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया है, जहां स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने, आय के नए साधन विकसित करने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाएगा।

परियोजना के लिए चयनित ग्राम पंचायतों में चौरा, देवल, कुचारम, बकटा बुजुर्ग, नांदी, तौरा, इटौरा, बाबूपुर, छछेरिहा बुजुर्ग और बुढ़ा सेमरवारा शामिल हैं। इन गांवों में महिलाओं को समूह आधारित गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने, स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

कार्यशाला के दौरान विषय विशेषज्ञ श्रीकांत ने महिलाओं को पशुपालन और जैविक खेती के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्मी कम्पोस्ट जैसी तकनीकों के उपयोग से खेती की लागत कम की जा सकती है और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। साथ ही बकरी पालन और केंचुआ पालन जैसी गतिविधियों को ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त आय का प्रभावी माध्यम बताते हुए इनसे जुड़े अनुदान और तकनीकी सहयोग की जानकारी भी साझा की गई।

कार्यक्रम में ब्लॉक समन्वयक आशाराम, फील्ड कोऑर्डिनेटर निलेश्वरी तथा विषय विशेषज्ञ सरोज कुमार ने परियोजना के विभिन्न पहलुओं, स्वयं सहायता समूहों के गठन, प्रशिक्षण, आजीविका संवर्धन और सरकारी योजनाओं के समन्वय पर विस्तार से जानकारी दी। कार्यशाला में बड़ी संख्या में महिला समूहों की सदस्य, ग्राम प्रधान और ग्रामीण उपस्थित रहे। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से संवाद कर परियोजना से जुड़े विभिन्न विषयों पर जानकारी प्राप्त की और उम्मीद जताई कि यह पहल ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी विकसित करेगी।

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