July 17, 2026

जबलपुर हाईकोर्ट का बेहद भावुक और ऐतिहासिक फैसला, 52 वर्ष की उम्र में महिला को मिली आईवीएफ के जरिए मां बनने की इजाजत

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मध्यप्रदेश: उच्च न्यायालय ने मातृत्व की इच्छा रखने वाली एक अधेड़ उम्र की महिला के पक्ष में बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने एक 52 वर्षीय महिला को ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ यानी आईवीएफ तकनीक के जरिए गर्भधारण करने की कानूनी मंजूरी दे दी है। न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला शारीरिक और चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह स्वस्थ है, तो उसे महज कानून में निर्धारित आयु सीमा पार कर लेने के आधार पर मां बनने के नैसर्गिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने जबलपुर में याचिकाकर्ता दंपत्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह याचिका एक ऐसे दंपत्ति द्वारा दायर की गई थी, जिनके इकलौते 21 वर्षीय बेटे की पीलिया की बीमारी के कारण असामयिक मृत्यु हो गई थी। इस गहरे सदमे से उबरने और अपने जीवन में दोबारा खुशियां लाने के उद्देश्य से इस दंपत्ति ने फिर से संतान प्राप्ति का प्रयास शुरू किया था। हालांकि, बढ़ती उम्र और शारीरिक जटिलताओं के कारण महिला के लिए प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना संभव नहीं हो पा रहा था।

स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में असफल रहने के बाद इस पीड़ित दंपत्ति ने चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक तकनीक आईवीएफ का सहारा लेने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने एक विशेषज्ञ अस्पताल से संपर्क किया, जहां शुरुआती चिकित्सकीय परीक्षणों में दोनों को शारीरिक रूप से इस प्रक्रिया के अनुकूल और पूरी तरह स्वस्थ पाया गया। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के कड़े कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए इस दंपत्ति का आईवीएफ उपचार करने से साफ इनकार कर दिया था।

मौजूदा कानून के तहत भारत में आईवीएफ कराने वाली महिला की आयु सीमा न्यूनतम 21 वर्ष और अधिकतम 50 वर्ष तय की गई है, जबकि पुरुष के लिए यह सीमा 21 से 55 वर्ष के बीच निर्धारित है। चूंकि महिला की आयु 52 वर्ष हो चुकी थी, इसलिए तकनीकी रूप से वह इस कानून के दायरे से बाहर हो रही थीं। इस कानूनी बाधा के खिलाफ दंपत्ति ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि कानून की बहुत ज्यादा कठोर व्याख्या करके उनसे माता-पिता बनने का आखिरी मौका नहीं छीना जाना चाहिए।

न्यायालय में सुनवाई के दौरान दंपत्ति ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए एक औपचारिक हलफनामा भी प्रस्तुत किया। इस हलफनामे में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे इस उम्र में आईवीएफ प्रक्रिया से जुड़े सभी संभावित चिकित्सकीय जोखिमों और उनके परिणामों को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस भावुक और तार्किक पक्ष को देखने के बाद अदालत ने माना कि मातृत्व की राह में केवल तकनीकी नियम आड़े नहीं आने चाहिए।

उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करते हुए अपने निर्णय में रेखांकित किया कि संबंधित कानून में दंपत्ति के लिए कोई संयुक्त आयु सीमा निर्धारित नहीं की गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता दंपत्ति किसी भी मान्यता प्राप्त चिकित्सा संस्थान में जाकर अपनी आईवीएफ प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में डॉक्टरों की विशेषज्ञता का सम्मान करते हुए अस्पताल को यह स्वतंत्रता भी दी है कि वे महिला की तात्कालिक चिकित्सकीय स्थिति का आकलन करने के बाद ही उपचार का अंतिम निर्णय लें।

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