July 15, 2026

पिता के निधन के सदमे से टूटकर जब मुंबई छोड़ ऋषिकेश भागे थे अभिनेता संजय मिश्रा, ढाबे पर 150 रुपये में बर्तन धोने और ऑमलेट बनाने को हुए थे मजबूर

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नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में अपनी बेमिसाल और सधे हुए अभिनय कला के दम पर ‘वध’, ‘भूल भुलैया’, ‘धमाल’ और ‘गोलमाल’ जैसी कई ब्लॉकबस्टर तथा कल्ट फिल्मों को सुपरहिट बनाने वाले मशहूर अभिनेता संजय मिश्रा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे पर्दे पर अपने हर एक किरदार में इस कदर जीवंतता भर देते हैं कि दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। वर्तमान समय में एक बेहद सफल, लोकप्रिय और करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने के बावजूद संजय मिश्रा के जीवन में एक ऐसा अंधकारमय और हृदयविदारक दौर भी आया था, जब वे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से पूरी तरह टूट चुके थे। उस कठिन समय में उन्होंने मायानगरी मुंबई और अभिनय जगत को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था और मानसिक शांति व सुकून की खोज में उत्तराखंड के ऋषिकेश चले गए थे।

अपने जीवन के उस अत्यंत संवेदनशील और संघर्षपूर्ण अध्याय को साझा करते हुए अभिनेता ने बताया कि एक समय वे शारीरिक रूप से बेहद गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए थे। उनकी स्वास्थ्य स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी थी कि चिकित्सकों को आपातकालीन चिकित्सा प्रक्रिया के तहत उनके पेट से लगभग 15 लीटर पस (मवाद) बाहर निकालना पड़ा था। उस दौरान उनकी स्थिति इतनी नाजुक थी कि डॉक्टरों ने उनके परिवार को स्पष्ट रूप से सचेत कर दिया था कि यदि यह जटिल ऑपरेशन सफल नहीं रहा, तो उनके जीवित बचने की संभावनाएं बेहद कम हैं। वे अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे और किसी तरह इस गंभीर सर्जरी से उबरने में सफल रहे।

शारीरिक पीड़ा के इस दौर से बाहर निकलते ही अभिनेता के जीवन पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पड़ा। जैसे ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली, उसके तुरंत बाद उनके पूजनीय पिता का अचानक देहांत हो गया। इस दोहरी मानसिक और शारीरिक त्रासदी ने उन्हें भीतर से पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था। पिता को खोने का दुख इस कदर गहरा था कि वे मानसिक रूप से पूरी तरह असंतुलित महसूस कर रहे थे और उनका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। जीवन से पूरी तरह से निराश और थका हुआ महसूस करने के कारण वे बिना किसी को बताए चुपचाप ऋषिकेश की ओर पलायन कर गए, जहां वे गंगा नदी के पावन तट पर एकांत में रहने लगे।

ऋषिकेश में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने अपनी पहचान पूरी तरह छुपाकर आजीविका चलाने के लिए गंगा किनारे स्थित एक साधारण से ढाबे पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। वहां वे ग्राहकों के लिए ऑमलेट बनाने का काम करने लगे। ढाबे के संचालक ने उनके सामने एक कठिन शर्त रखी थी कि उन्हें प्रतिदिन कम से कम 50 कप और बर्तन धोने होंगे, जिसके बदले में उन्हें पारिश्रमिक के रूप में मात्र 150 रुपये प्रतिदिन दिए जाएंगे। मानसिक अशांति से जूझ रहे संजय मिश्रा उस समय किसी भी प्रकार के शारीरिक श्रम के लिए सहर्ष तैयार हो गए क्योंकि वे अपने दिमाग को दुनिया भर की चिंताओं से मुक्त रखना चाहते थे।

अपने पिता को याद करते हुए अभिनेता ने उनके साथ हुई अपनी अंतिम और भावुक बातचीत का भी स्मरण किया। उन्होंने बताया कि निधन से कुछ समय पूर्व उनके पिता ने उनसे कहा था कि वे तीन दिन पुराना चिकन क्यों खा रहे हैं, जिस पर उन्होंने अज्ञानतावश और झुंझलाहट में उत्तर दिया था कि उन्हें इस प्रकार की नसीहतों की कोई आवश्यकता नहीं है। पिता के साथ हुई यह अंतिम तीखी बहस आज भी उनके मन में एक मलाल की तरह कचोटती है। अभिनेता ने स्वीकार किया कि वे आज भी जब कभी अत्यधिक तनाव या मानसिक अशांति महसूस करते हैं, तो वे अचानक आध्यात्मिक शहरों की ओर निकल जाते हैं और सभी से संपर्क तोड़कर अपने मस्तिष्क को स्वतंत्र रखने का प्रयास करते हैं।

वर्तमान समय की बात करें तो संजय मिश्रा अपने उस बुरे दौर को पीछे छोड़कर मनोरंजन जगत में एक बहुत बड़ा नाम बन चुके हैं। वे न केवल रूपहले पर्दे पर बल्कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी अपनी बेहतरीन अदाकारी का लोहा मनवा रहे हैं। आज वे एक बेहद आलीशान और लैविश लाइफस्टाइल जीते हैं तथा करोड़ों रुपये मूल्य के भव्य बंगले के स्वामी हैं। उनका यह जीवन वृत्त इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और आंतरिक शांति के बल पर मनुष्य जीवन के सबसे गहरे संकटों और दुखों से उबरकर पुनः सफलता के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त कर सकता है।

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