July 13, 2026

अब यूरोप भी नहीं सुरक्षित जलवायु परिवर्तन की मार से रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने बढ़ाई चिंता लाखों लोग हुए प्रभावित

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नई दिल्ली । एक समय था जब भीषण गर्मी का नाम आते ही भारत पाकिस्तान और पश्चिम एशिया जैसे देशों की तस्वीर सामने आती थी जबकि यूरोप को अपेक्षाकृत ठंडे मौसम वाला महाद्वीप माना जाता था। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। जून 2026 में पश्चिमी यूरोप में पड़ी रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। नई वैज्ञानिक रिपोर्ट बताती है कि यह केवल एक सामान्य हीटवेव नहीं थी बल्कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इसे पहले की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक और जानलेवा बना दिया।

ClimaMeter की रिपोर्ट के अनुसार जून 2026 के दौरान बनी गर्म मौसमीय परिस्थितियां करीब 30 वर्ष पहले की तुलना में लगभग ढाई डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म थीं जबकि यदि 50 वर्ष पहले से तुलना की जाए तो यह अंतर साढ़े तीन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। यही अतिरिक्त तापमान इस हीटवेव को बेहद गंभीर बना गया। रिपोर्ट के अनुसार इस गर्मी से लगभग 32 करोड़ 70 लाख लोग प्रभावित हुए जबकि करीब 15 दशमलव 6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक गतिविधियां इसकी चपेट में आईं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे क्षेत्रों की रही जहां सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस हीटवेव के पीछे हीट डोम नामक मौसमीय स्थिति भी जिम्मेदार रही। इसमें उच्च दबाव वाला क्षेत्र लंबे समय तक एक ही स्थान पर बना रहता है जिससे गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती और तापमान लगातार बढ़ता जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि हीट डोम कोई नई घटना नहीं है लेकिन अब पृथ्वी का औसत तापमान पहले से अधिक होने के कारण इसका प्रभाव कहीं ज्यादा विनाशकारी हो गया है।

फ्रांस के वैज्ञानिक मार्को जांची का कहना है कि कुछ दशक पहले यही मौसमीय स्थिति इतनी खतरनाक नहीं होती। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन ने वातावरण को पहले से गर्म कर दिया है जिससे सामान्य हीटवेव भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में बदल रही है। यही कारण है कि यूरोप जैसा क्षेत्र भी अब भीषण गर्मी से सुरक्षित नहीं रह गया है।

इटली के वैज्ञानिक टोमासो अल्बर्टी के अनुसार पहले से गर्म हो चुकी जमीन और समुद्र ने इस हीटवेव की तीव्रता कई गुना बढ़ा दी। इसके चलते हीट स्ट्रेस बढ़ा अस्पतालों पर दबाव बढ़ा बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई और कई क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हुई। गर्मी से होने वाली मौतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि अब ऐसी घटनाओं को अपवाद नहीं बल्कि नया सामान्य माना जाना चाहिए।

यह अध्ययन भारत के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। भारत पिछले कई वर्षों से लगातार भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है और अब वही स्थिति यूरोप में भी दिखाई देने लगी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यूरोप 1990 के दशक के बाद दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। इससे स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरी दुनिया इसकी चपेट में आ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना ही पर्याप्त नहीं होगा। शहरों को गर्मी के अनुकूल विकसित करना होगा स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना होगा बिजली व्यवस्था को अधिक सक्षम बनाना होगा और स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में हीटवेव की घटनाएं और अधिक तीव्र हो सकती हैं इसलिए समय रहते ठोस कदम उठाना पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।

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