भारत-अमेरिका ट्रेड डील अंतिम चरण में, लेकिन टैरिफ बढ़त के बिना लागू नहीं होगा समझौता: पीयूष गोयल
लंदन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार कार्यक्रम के दौरान गोयल ने कहा कि किसी भी मुक्त व्यापार समझौते का मूल उद्देश्य प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर बाजार पहुंच हासिल करना होता है। भारत चाहता है कि उसे अमेरिका के साथ व्यापार में ऐसी टैरिफ व्यवस्था मिले, जिससे वह चीन, वियतनाम, बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार और फिलीपींस जैसे देशों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी स्थिति में आ सके।
उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच इस समझौते की बुनियादी सहमति इसी वर्ष फरवरी में बन गई थी। दोनों देशों ने समझौते की व्यापक रूपरेखा पर सहमति जताई थी और उसके बाद से तकनीकी, कानूनी तथा टैरिफ संबंधी विवरणों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है। गोयल के अनुसार समझौते को लेकर किसी प्रकार की अस्पष्टता नहीं है, बल्कि अब केवल उन शर्तों को सुनिश्चित किया जा रहा है जो भारत के व्यापारिक हितों को मजबूत करें।
व्यापार मंत्रालय का मानना है कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और ऐसे समय में किसी भी समझौते का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब उससे निर्यातकों को प्रत्यक्ष आर्थिक फायदा प्राप्त हो। इसी कारण भारत अमेरिका के साथ ऐसी टैरिफ संरचना चाहता है जो उसके उद्योगों और निर्यातकों को अन्य प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले बढ़त प्रदान करे।
फरवरी में हुई अंतरिम सहमति के तहत अमेरिका भारतीय उत्पादों पर कुछ श्रेणियों में शुल्क दरों को कम करने पर सहमत हुआ था। इसके साथ ही कुछ अतिरिक्त शुल्कों में राहत देने पर भी चर्चा हुई थी, जिससे भारतीय निर्यातकों को फायदा मिल सकता था। उस समय प्रस्तावित व्यवस्था को भारत के लिए लाभकारी माना गया था क्योंकि इससे कई एशियाई प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर व्यापारिक स्थिति बनने की संभावना थी।
हालांकि इसके बाद अमेरिका में कानूनी और नीतिगत परिस्थितियों में बदलाव देखने को मिला। अमेरिकी न्यायिक प्रक्रिया और टैरिफ प्राधिकरण से जुड़े निर्णयों के कारण व्यापार नीति को लेकर कुछ नई अनिश्चितताएं सामने आईं। इसी दौरान अस्थायी टैरिफ व्यवस्था लागू की गई, जिसकी समयसीमा जुलाई के अंत तक निर्धारित है। भारत अब उस अवधि के बाद बनने वाली अंतिम टैरिफ संरचना का इंतजार कर रहा है।
इसके समानांतर अमेरिका ने कुछ व्यापारिक मामलों को लेकर जांच प्रक्रियाएं भी शुरू की हैं, जिनके निष्कर्ष भविष्य की शुल्क व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। भारत इन सभी पहलुओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन कर रहा है ताकि किसी भी समझौते का दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख उसके बदलते आर्थिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। सरकार अब केवल व्यापार समझौते करने पर जोर नहीं दे रही, बल्कि ऐसे समझौते चाहती है जो भारतीय उद्योगों, निर्यातकों और निवेशकों को वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करें। आने वाले हफ्तों में अमेरिका की अंतिम टैरिफ नीति और जांच संबंधी निष्कर्ष सामने आने के बाद दोनों देशों के बीच इस बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना है।
