June 22, 2026

चातुर्मास कब से शुरू होगा? जानिए तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा-विधि और पालन के प्रमुख नियम

0
3-jun-1782114070

नई दिल्ली। सनातन धर्म में चातुर्मास को भक्ति, तपस्या और आत्मसंयम का विशेष काल माना जाता है। यह चार महीने का पावन समय भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी पर जागते हैं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।

द्रिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से होगी और इसका समापन 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन होगा। इस दौरान श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास आएंगे।

क्या है चातुर्मास का धार्मिक महत्व?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार और अन्य मांगलिक कार्यों को स्थगित रखा जाता है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ ही शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत फिर से हो जाती है।

पौराणिक कथाओं में चातुर्मास का संबंध राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार से बताया गया है। कथा के अनुसार, भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी। दो पग में उन्होंने पृथ्वी और आकाश को नाप लिया, जबकि तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया और चार माह तक उनके द्वार पर रहने का संकल्प लिया। इसी परंपरा से चातुर्मास की मान्यता जुड़ी मानी जाती है।

चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?

चातुर्मास के दौरान विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार सहित अन्य बड़े शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है। हालांकि नियमित पूजा-पाठ, सत्यनारायण कथा, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों पर कोई रोक नहीं होती। बल्कि इस समय को साधना, ध्यान और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

चातुर्मास में खान-पान के नियम

इस अवधि में सात्विक जीवनशैली अपनाने और खान-पान में संयम रखने की सलाह दी जाती है। कई श्रद्धालु गुड़, तेल, बैंगन, हरी पत्तेदार सब्जियां, अधिक मसालेदार और तामसिक भोजन का त्याग करते हैं। वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले भक्त प्याज, लहसुन और कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से भी दूरी बनाए रखते हैं।

मास अनुसार परहेज के नियम इस प्रकार बताए गए हैं

श्रावण मास: पालक और हरी पत्तेदार सब्जियों से परहेज।
भाद्रपद मास: दही का सेवन नहीं किया जाता।
आश्विन मास: दूध का त्याग करने की परंपरा है।
कार्तिक मास: मांसाहार, विशेष रूप से मछली का सेवन वर्जित माना जाता है।

चातुर्मास में कैसे करें पूजा और साधना?

चातुर्मास का पालन घर पर रहकर भी सरलता से किया जा सकता है। इसके लिए प्रतिदिन भगवान विष्णु की आराधना, मंत्र-जाप और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है।

– प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर भगवान विष्णु की पूजा करें।
– दीप प्रज्वलित कर तुलसी दल अर्पित करें।
– विष्णु सहस्रनाम अथवा हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करें।
– चातुर्मास में कम से कम एकादशी व्रत अवश्य रखें।
– किसी एक प्रिय वस्तु या आदत का त्याग कर व्यक्तिगत संकल्प लें।
– श्रीमद्भागवत, रामायण या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ एवं श्रवण करें।
– अन्नदान, जरूरतमंदों की सहायता और धार्मिक सेवा कार्यों में सहभागिता करें।
धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास केवल व्रत और नियमों का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, अनुशासन और ईश्वर भक्ति को जीवन में उतारने का अवसर भी माना जाता है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *