June 5, 2026

दतिया की राजनीति में हलचल, BJP-कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल बन सकता है उपचुनाव

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मध्य प्रदेश । दतिया विधानसभा सीट रिक्त होने के बाद संभावित उपचुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक ओर पूर्व गृहमंत्री Narottam Mishra अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए सामाजिक समीकरण साध रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस में टिकट को लेकर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय स्तर पर जनता का एक बड़ा वर्ग भाजपा और कांग्रेस दोनों से नाराज नजर आ रहा है।

उपचुनाव का इंतजार, 14 जुलाई पर टिकी निगाहें
दतिया में इन दिनों चौराहों, बाजारों और राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा संभावित विधानसभा उपचुनाव की है। हालांकि अभी चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है, लेकिन माना जा रहा है कि चुनाव आयोग की नजर 14 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर है। इसके बाद ही चुनावी प्रक्रिया को लेकर तस्वीर साफ हो सकती है। इसी संभावना को देखते हुए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों के नेता लगातार जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों में जुटे हुए हैं।

2023 की हार का बोझ अब भी नरोत्तम मिश्रा के साथ
दतिया की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नरोत्तम मिश्रा अपनी पिछली हार की भरपाई कर पाएंगे? 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसई क्षेत्र में अपेक्षित समर्थन नहीं मिलना उनकी हार की बड़ी वजह बना। भाजपा को उम्मीद थी कि 2018 की तरह अंतिम चरणों में वोटों का बड़ा अंतर उनके पक्ष में जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

स्थानीय लोगों के मुताबिक हार के पीछे केवल विपक्ष की ताकत नहीं, बल्कि संगठन के भीतर की निष्क्रियता, कार्यकर्ताओं का अति आत्मविश्वास और जनता की नाराजगी भी जिम्मेदार रही। कई लोगों का कहना है कि विकास कार्य होने के बावजूद कुछ स्थानीय समस्याओं का समाधान समय पर नहीं होने से असंतोष बढ़ा।

अब मिश्रा लगातार सामाजिक सम्मेलन, समाज प्रमुखों से मुलाकात और कार्यकर्ताओं के संपर्क अभियान के जरिए अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

राजेंद्र भारती के कार्यकाल पर जनता की मिली-जुली राय

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में Rajendra Bharti का कार्यकाल भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि वे जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए। कई लोगों का आरोप है कि वे आम जनता से दूर रहे और क्षेत्रीय विकास को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी।

हालांकि कांग्रेस नेताओं का दावा है कि प्रशासनिक असहयोग और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कई विकास कार्य कराए। पार्टी नेताओं का कहना है कि विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने जनता की समस्याओं को मजबूती से उठाया।

कांग्रेस में टिकट को लेकर बढ़ी खींचतान
उपचुनाव से पहले कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक एकजुटता बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार राजेंद्र भारती अपने बेटे अनुज भारती के लिए टिकट की पैरवी कर रहे हैं। वहीं, पिछले चुनाव में दावेदारी छोड़ चुके अवधेश नायक भी खुद को मजबूत उम्मीदवार मान रहे हैं। इसके अलावा पूर्व विधायक घनश्याम सिंह के समर्थक भी सक्रिय हैं। हाल ही में Rahul Gandhi से हुई मुलाकातों और संभावित दावेदारों की सक्रियता ने कांग्रेस के भीतर प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया है। हालांकि पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से गुटबाजी से इनकार कर रहा है और दावा कर रहा है कि उम्मीदवार का चयन सर्वे और जीत की संभावना के आधार पर होगा।

आजाद समाज पार्टी भी बना रही मजबूत जमीन
दतिया के संभावित चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में आजाद समाज पार्टी भी सक्रिय है। दामोदर यादव लगातार किसान सम्मेलनों और जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यादव मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उनके साथ जाता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों उनके प्रभाव को गंभीरता से देख रही हैं।

जातीय समीकरण बन सकते हैं चुनाव का निर्णायक फैक्टर
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि दतिया उपचुनाव केवल विकास या स्थानीय मुद्दों पर नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि जातीय और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यादव, कुशवाहा और ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या यहां निर्णायक मानी जाती है। अलग-अलग दल इन वर्गों को साधने के लिए विशेष रणनीति बना रहे हैं। भाजपा जहां सामाजिक सम्मेलनों के जरिए विभिन्न समुदायों तक पहुंच रही है, वहीं कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने में जुटी है।

जनता का संदेश साफ: केवल वादे नहीं, काम चाहिए
दतिया के राजनीतिक माहौल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय स्तर पर दोनों प्रमुख दलों के प्रति असंतोष दिखाई देता है। कई नागरिकों का कहना है कि वे अब केवल राजनीतिक दावों से प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि उम्मीदवार की पहुंच, जवाबदेही और क्षेत्रीय विकास के आधार पर निर्णय लेंगे। यही कारण है कि संभावित उपचुनाव में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को हासिल करने की चुनौती भी होगा।

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