ठेका व्यवस्था पर सवाल, खन्ना बंजारी साइडिंग में श्रमिकों की अनदेखी से बढ़ा संकट
रेलवे साइडिंग पर गिट्टी लोडिंग का कार्य चौबीसों घंटे जारी रहता है। इस काम में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष मजदूर शामिल हैं। एक रैक में मौजूद 59 डिब्बों को भरने के लिए लगभग 826 मजदूरों की जरूरत होती है, जो लगातार भारी श्रम करते हुए अपनी जीविका चलाते हैं। लेकिन इस कठिन कार्य के बावजूद उन्हें सुरक्षा के नाम पर लगभग कुछ भी उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।
नियमानुसार इस तरह के उच्च जोखिम वाले कार्यों में मजदूरों को दस्ताने, जूते, मास्क और अन्य सुरक्षा उपकरण दिए जाने चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। मजदूरों का आरोप है कि ठेकेदार और माइंस प्रबंधन सुरक्षा मानकों की पूरी तरह अनदेखी कर रहे हैं। न केवल सुरक्षा उपकरणों की कमी है, बल्कि पीने के लिए ठंडा पानी तक उपलब्ध नहीं कराया गया है, जिससे भीषण गर्मी में उनकी परेशानी और बढ़ गई है।
मजदूरों का कहना है कि उन्हें केवल गर्मी ही नहीं, बल्कि कड़कड़ाती ठंड और बारिश में भी इसी तरह बिना सुरक्षा उपकरणों के काम करना पड़ता है। गिट्टी लोडिंग के दौरान उड़ने वाली बारीक धूल लगातार उनके शरीर और फेफड़ों में जा रही है, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। कई मजदूरों ने आशंका जताई है कि वे सिलिकोसिस जैसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आ सकते हैं, जो लंबे समय में जानलेवा साबित हो सकती है।
श्रमिकों में अशोक कोल, प्रेम बाई और वंदना सहित कई मजदूरों ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। काम के दौरान लगातार दुर्घटना का खतरा बना रहता है, लेकिन मजबूरी में उन्हें इसी हालात में काम करना पड़ रहा है।
इस पूरे मामले को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों ने प्रतिक्रिया दी है कि स्थिति को गंभीरता से लिया गया है। उन्होंने कहा है कि जल्द ही माइंस प्रबंधन और संबंधित ठेकेदारों को तलब किया जाएगा और पूरे मामले की विस्तृत समीक्षा की जाएगी। साथ ही श्रमिकों की सुरक्षा, उन्हें मिलने वाली सुविधाओं और नियमों के पालन की जांच की जाएगी। यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी और समस्या का तत्काल समाधान सुनिश्चित किया जाएगा।
फिलहाल खन्ना बंजारी साइडिंग पर काम कर रहे मजदूरों की स्थिति प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक गंभीर सवाल बनकर खड़ी है, जिसका समाधान अब समय की मांग बन चुका है।
