ISRO से टक्कर की कोशिश या प्रोपेगेंडा? EO-3 सैटेलाइट की ‘फर्जी तस्वीरों’ पर उठे सवाल, पाकिस्तान की मंशा पर बहस तेज
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने EO-3 को रिमोट सेंसिंग और इमेजिंग क्षमताओं में बड़ा सुधार करने वाला बताया था। साथ ही इसमें एडवांस पेलोड, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोसेसिंग और मल्टी-स्पेक्ट्रल इमेजिंग जैसी क्षमताओं का दावा किया गया। हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि इन दावों की पुष्टि के लिए अभी ठोस तकनीकी प्रमाण सामने नहीं आए हैं।
विवाद तब गहराया जब कराची बंदरगाह की एक तस्वीर को EO-3 से ली गई पहली इमेज बताकर सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) विशेषज्ञों ने जांच में पाया कि यही तस्वीर पहले से 2025 में ही ऑनलाइन उपलब्ध थी। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।
पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से बाहरी सहयोग, खासकर चीन पर निर्भर रहा है। उसकी अंतरिक्ष एजेंसी SUPARCO ने अतीत में भी कई प्रोजेक्ट विदेशी तकनीक के सहारे पूरे किए हैं। उदाहरण के तौर पर Paksat-1 उपग्रह, जिसे मूल रूप से इंडोनेशिया का Palapa-C1 बताया जाता है, बाद में पाकिस्तान ने अपने नाम से प्रस्तुत किया था। इसी तरह Paksat-1R का निर्माण और प्रक्षेपण भी चीन के सहयोग से हुआ था।
EO-3 को लेकर भी यही चर्चा है कि इसमें चीन की तकनीकी भूमिका अहम रही है। ऐसे में “स्वदेशी क्षमता” के दावे पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की असली ताकत उसकी तकनीकी आत्मनिर्भरता और डेटा की विश्वसनीयता से तय होती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के अंतरिक्ष संगठन Indian Space Research Organisation और पाकिस्तान की एजेंसी SUPARCO के बीच तुलना की बहस को भी फिर से हवा दे दी है। जहां ISRO को उसकी स्वदेशी तकनीक और लगातार सफल मिशनों के लिए वैश्विक स्तर पर सराहना मिलती रही है, वहीं पाकिस्तान के दावों पर बार-बार सत्यापन की जरूरत सामने आती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होती है। ऐसे में अधूरी या संदिग्ध जानकारी के आधार पर किए गए दावे न केवल अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करते हैं, बल्कि भविष्य के सहयोग और विश्वास पर भी असर डाल सकते हैं।
कुल मिलाकर EO-3 सैटेलाइट को लेकर उठा यह विवाद सिर्फ एक तस्वीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम वास्तविक प्रगति कर रहा है या फिर यह सिर्फ छवि निर्माण की कोशिश है? आने वाले समय में इस सवाल का जवाब और स्पष्ट हो सकता है।
