April 24, 2026

‘खवातीन’ विंग: भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए अदृश्य चुनौती बना महिला जिहादी नेटवर्क

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प्रतीकात्मक फोटो

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@डॉ. मयंक चतुर्वेदी की कलम से…

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भारत की आंतरिक सुरक्षा के सामने इस्‍लामिक आतंकवाद की चुनौती अब अपने पारंपरिक स्वरूप से कहीं आगे बढ़ चुकी है। यह अब यह एक ऐसे जटिल, बहुस्तरीय और तकनीकी रूप से सक्षम नेटवर्क में परिवर्तित हो चुकी है, जिसकी जड़ें समाज के भीतर गहराई तक फैल रही हैं। इससे पहले हम यही अनुभव करते थे कि जिहादी आतंकवाद सीमापार से होने वाली घुसपैठ या संगठित हमलों तक सीमित है, पर वर्तमान में इस बदलते परिदृश्य में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने इसे एक नए संकट के रूप में प्रस्‍तुत किया है।

 जिहादी: महिलाओं की बढ़ती भूमिका
विशेषकर इस्लामिक जिहादी संगठनों से जुड़े नेटवर्क में महिलाओं की बढ़ती भूमिका गंभीर खतरे के रूप में उभर रही है। आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा हैदराबाद की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सईदा की गिरफ्तारी इस नए ट्रेंड का एक बड़ा उदाहरण है, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि आतंकवाद नए दौर में डिजिटल प्रभाव और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का एक संगठित अभियान बन चुका है। सईदा पर लगे आरोप इस बात को रेखांकित करते हैं कि कैसे आधुनिक इस्‍लामिक जिहादी आतंकी संगठन सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं, विशेषकर महिलाओं को निशाना बना रहे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, वह इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) और इन द अल-कायदा इंडियन सबकॉन्टिनेंट (एक्‍यूआईएस) से जुड़े ऑनलाइन नेटवर्क में सक्रिय थी, जहां ओसामा बिन लादेन के वीडियो और जाकि‍र नायक जैसे कट्टरपंथी के भाषणों का प्रसार किया जाता था। यह पूरा नेटवर्क इस बात का उदाहरण है कि आतंकवाद अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए घर-घर तक पहुंच रहा है और इस प्रक्रिया में महिलाएं एक महत्वपूर्ण कड़ी बनती जा रही हैं।

महिलाओं की कट्टपंथी मॉड्यूल में संलिप्तता बढ़ी
यदि हम उपलब्ध आंकड़ों और रिपोर्ट्स पर नजर डालें तो यह प्रवृत्ति और भी स्पष्ट हो जाती है। राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और गृह मंत्रालय भारत सरकार (एमएचए) के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत में पकड़े गए कट्टरपंथी मॉड्यूल्स में महिलाओं की संलिप्तता में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स और अपराध कार्यालय की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर आईएसआईएस जैसे संगठनों में 15 से 20 प्रतिशत तक सदस्य महिलाएं रही हैं और उनकी भूमिका अब सिर्फ सहायक होने तक सीमित नहीं रही है, वे जिहाद के लिए जिसमें कि गैर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है, रणनीतिक और ऑपरेशनल भी हो चुकी हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो महिला जिहादी नेटवर्क वर्ष पूर्व से दिखाई देता रहा है, किंतु पहले यह बहुत सीमित स्‍थ‍िति में था, पर आज ऐसा बिल्‍कुल भी नहीं है यह विश्‍व के शांत एवं लोकतांत्रिक समुदाय के लिए तेजी से विकसित होता हुआ खतरा है। आतंकवादी शमीमा बेगम का ही मामला देख लें, जोकि यह दर्शाता है कि कैसे किशोरावस्था की लड़कियां भी ऑनलाइन ब्रेनवॉशिंग का शिकार होकर अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क का हिस्सा बन सकती हैं। ऐसे ही एक जिहादी आतंकी तश्फीन मलिक ने अमेरिका में हुए हमले में प्रत्यक्ष भागीदारी निभाकर यह मिथक तोड़ा कि महिलाएं सिर्फ सहायक भूमिका में हो सकती हैं। हयात बौमेद्दीन, साजिदा अल-रिशावी, मुरिएल डेगाउक और सैली जोन्स जैसे नाम इस वैश्विक नेटवर्क की व्यापकता और विविधता को उजागर करते हैं।

महिला कट्टरपंथियों का भारत में बढ़ता खतरा
भारतीय संदर्भ में भी यह खतरा धीरे-धीरे बढ़ता हुआ दिखाई देता है। अफशा जहांजेब, सना फातिमा, रुबिना शेख, नाजिया इलाही और समिया खातून जैसे मामलों में एक समान पैटर्न दिखा, सोशल मीडिया के जरिए संपर्क, वैचारिक कट्टरता का प्रसार और फिर धीरे-धीरे नेटवर्क का विस्तार करते हुए गैर मुसलमानों के प्रति घृणा के चर्मोत्‍कर्ष पर पहुंचकर उनके विरुद्ध हिंसा का मार्ग अपना लेना। यह पैटर्न इस बात का संकेत है कि आतंकवादी संगठन अब “लो-प्रोफाइल, हाई-इम्पैक्ट” रणनीति पर काम कर रहे हैं, ताकि उन्‍हें आसानी से पकड़ा न जा सके।

खवातीन ब्रिगेड क्या है ?
सईदा के मामले में सामने आई ‘खवातीन’ विंग की योजना इस पूरे परिदृश्य को और अधिक गंभीर बना देती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं, यह कितना संगठित प्रयास का हिस्सा है, जिसमें महिलाओं के लिए अलग से संरचित संगठन बनाने, उन्हें हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण देने और पूरे देश में हमलों के लिए तैयार करने की योजना शामिल थी। आईएसआईएस पहले ही “अल-खंसा ब्रिगेड” जैसी महिला इकाइयों के माध्यम से इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर चुका है और अब इसी रणनीति का विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है।जिसमें कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इस पूरे नेटवर्क को अभूतपूर्व गति और विस्तार दिया है।

साक्ष्‍य यही बता रहे हैं कि व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम जैसे माध्यमों पर एन्क्रिप्टेड ग्रुप्स और क्लोज्ड कम्युनिटीज के जरिए कट्टरपंथी विचारधारा का प्रसार बेहद आसान हो गया है। सईदा का 38,000 फॉलोअर्स वाला सोशल मीडिया नेटवर्क इस बात का प्रमाण है कि कैसे “इन्फ्लुएंसर संस्कृति” का उपयोग अब आतंकवादी संगठन भी कर रहे हैं। वस्‍तुत: यह एक ऐसा नया मोर्चा है, जहां विचारधारा, पहचान और भावनात्मक अपील के जरिए युवाओं को धीरे-धीरे प्रभावित किया जाता है।

आखिर क्यों आतंकियों के लिए आसान लक्ष्य हैं महिलाएं
महिलाओं को इस नेटवर्क का हिस्सा बनाने के पीछे आतंकी संगठनों की रणनीति भी अत्यंत सुनियोजित है। महिलाएं समाज में अपेक्षाकृत कम संदेह के दायरे में आती हैं, उनकी सामाजिक पहुंच अधिक होती है और वे भावनात्मक रूप से लोगों को प्रभावित करने में सक्षम होती हैं। यही कारण है कि उन्हें भर्ती, प्रचार और नेटवर्क विस्तार के लिए एक प्रभावी माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। यह पूरा परिदृश्य इस बात का संकेत देता है कि आतंकवाद का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब यह सिर्फ भौतिक हमलों तक सीमित नहीं है, वस्‍तुत: एक वैचारिक युद्ध बन चुका है, जिसमें सोशल मीडिया, मनोविज्ञान और सामाजिक संरचना का गहन उपयोग किया जा रहा है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों के स्तर पर भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं।

राष्‍ट्रीय जांच अभिकरण (एनआईए) द्वारा साइबर मॉनिटरिंग को मजबूत किया गया है, जबकि गृह मंत्रालय ने डीरैडिकलाइजेशन कार्यक्रमों की शुरुआत की है। इसके साथ ही आज यदि हम अपनी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों जैसे एफबीआई, एमआई5 और यूरोपोल की आतंकवाद निरोध, निर्मूलन से तुलना करें, तो यह ध्‍यान में आता है कि भारत अभी भी मुख्यतः “रिएक्टिव” दृष्टिकोण पर काम कर रहा है, जबकि पश्चिमी देश “प्रिवेंटिव” और “कम्युनिटी-आधारित” मॉडल को अधिक महत्व दे रहे हैं।

ऐसे में कहना यही है कि सईदा जैसे मामले इस नए आतंकवादी जिहादी मॉड्यूल की एक झलक भर हैं। वस्‍तुत: एक ऐसे व्यापक और अदृश्य नेटवर्क की झलक, जोकि आने वाले समय में भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए और भी गंभीर चुनौती बन सकता है। आज हैदराबाद की सईदा जैसी घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि अब आतंकवाद समाज के भीतर डिजिटल माध्यमों और वैचारिक प्रभाव के जरिए फैल रहा है। इस्‍लामिक जिहादी संगठन अब महिलाओं को भर्ती, प्रचार और नेटवर्क विस्तार के लिए कर रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इस खतरे से निपटने के लिए न केवल सरकार, आम नागरिक भी सजग और सक्रिय भूमिका निभाएँ।

आतंकवाद और कट्टरपंथ पर लिखी पुस्तकों से खुलासा
इस संदर्भ में आतंकवाद और कट्टरपंथ पर लिखी गई कई महत्वपूर्ण पुस्तकों और शोधों से हमें दिशा मिलती है। उदाहरण के लिए ब्रूस हॉफमैन की प्रसिद्ध पुस्‍तक “इनसाइड टेररिज़्म” (कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस) में यह स्पष्ट किया गया है कि आधुनिक आतंकवाद सिर्फ हिंसा का साधन एक “मनोवैज्ञानिक युद्ध” है, जिसका उद्देश्य समाज में भय और भ्रम पैदा करना है। हॉफमैन लिखते हैं कि “आतंकवाद की सफलता उसकी हिंसा से कहीं अधिक उसके प्रभाव में होती है।” इसी तरह पुस्तक “लीडरलेस जिहाद” (लेखक: मार्क सेजमैन, प्रकाशक: यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया प्रेस) यह बताती है कि आज के आतंकवादी नेटवर्क “विकेन्द्रीकृत” हो चुके हैं, जहाँ छोटे-छोटे सेल्स और ऑनलाइन नेटवर्क के माध्यम से भर्ती और कट्टरपंथ का विस्तार किया जाता है। सईदा का मामला इसी “लीडरलेस नेटवर्क” का उदाहरण है, जहाँ एक व्यक्ति सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है।

महिलाओं की भूमिका पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हुए मिया ब्लूम की पुस्तक “बॉम्बशेल: वुमेन एंड टेररिज़्म” (यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया प्रेस) अत्यंत महत्वपूर्ण है। ब्लूम लिखती हैं कि आतंकवादी संगठन महिलाओं का उपयोग इसलिए करते हैं क्योंकि वे “कम संदेहास्पद, अधिक प्रभावशाली और सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य” होती हैं। यह विश्लेषण भारत के संदर्भ में पूरी तरह लागू होता है, जहाँ महिलाएं परिवार और समाज के भीतर गहराई से जुड़ी होती हैं।

अब प्रश्न यह है कि इस उभरते खतरे से भारत सरकार और नागरिक कैसे बचाव कर सकते हैं? इसे लेकर लेखिका ऑड्री कर्थ क्रोनिन एक सुझाव सभी सरकारों के लिए साझा करती हैं, वे अपनी पुस्‍तक “हाउ टेररिज़्म एंड्स” (प्रकाशक: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस) में लिखती हैं कि आतंकवाद का अंत सैन्य कार्रवाई से नहीं हो सकता है, यह यदि होगा तो वह “सामाजिक और वैचारिक हस्तक्षेप” से ही होना संभव है। वस्‍तुत: इसका अर्थ है कि सरकार को डीरैडिकलाइजेशन (कट्टरपंथ-निरोध) कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए, विशेषकर महिलाओं और युवाओं के लिए उसे अलग-अलग तरह से कार्यक्रम बनाने चाहिए, वैचारिक आयोजन करने चाहिए और उन्‍हें बताना चाहिए कि कैसे उनकी गतिविधि उनके देश और उनके ही समाज के लिए हानिकारक है। इसके अलावा, शिक्षा प्रणाली में “क्रिटिकल थिंकिंग” और डिजिटल साक्षरता को शामिल करना आवश्यक है, ताकि युवा किसी भी प्रकार के ऑनलाइन प्रोपेगैंडा को पहचान सकें।

आतंकी कानूनों को और अधिक सख्त करने की है आवश्यकता
यह भी चाहिए कि सरकार साइबर अपराध और आतंकवाद से संबंधित कानूनों को और अधिक सख्त और आधुनिक बनाए। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों जैसे एफबीआई और यूरोपोल की तरह भारत को भी “प्री-एम्प्टिव एक्शन” (पूर्व-निरोधात्मक कार्रवाई) की नीति अपनानी होगी। यहां सभी समझलें कि आतंकवाद से लड़ाई सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, इसमें नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आम लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर मिलने वाली हर जानकारी सही नहीं होती। किसी भी संदिग्ध गतिविधि, समूह या व्यक्ति की सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन को देनी चाहिए।

यहाँ ध्यान आते हैं युवाल नोआ हरारी, वे अपनी पुस्तक “21 लेसन्स फॉर द 21स्ट सेंचुरी” (प्रकाशक: पेंगुइन रैंडम हाउस) में लिखते हैं कि “आज के युग में सबसे बड़ा खतरा जानकारी की कमी नहीं, बल्कि गलत जानकारी और भ्रामक नैरेटिव का तेज़ी से फैलना है, जोकि लोगों की सोच और निर्णय को प्रभावित करता है।” निश्‍चित ही उनका यह कहना आज डिजिटल कट्टरपंथ के संदर्भ में पूरी तरह सटीक है।

महिला आतंकवाद पर सतर्क रहने की आवश्यकता
महिला आतंकवाद के बढ़ते मामलों को देखते हुए परिवारों को विशेष रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है। बच्चों और महिलाओं के ऑनलाइन व्यवहार पर ध्यान देना, उनके मित्रों और डिजिटल गतिविधियों को समझना अत्यंत आवश्यक है। फरीद जकारिया की पुस्तक “द पोस्ट-अमेरिकन वर्ल्ड” (डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन एंड कंपनी) में यह उल्लेख मिलता है कि “सामाजिक असंतुलन और पहचान का संकट अक्सर कट्टरपंथ की ओर ले जाता है।” इसलिए समाज में समावेशिता और संवाद को बढ़ावा देना जरूरी है। वहीं आतंकवाद का मुकाबला हथियारों से कहीं अधिक और पहले विचारधारा से भी करना है, इसके लिए धार्मिक नेताओं, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मिलकर काम करने की आवश्‍यकता है। होगा, ताकि कट्टरपंथी इस्‍लामिक जिहादी विचारधारा का प्रभाव समाप्‍त किया जा सके।

आज देश के सामने महिला जिहादी नेटवर्क का उभरता खतरा सिर्फ एक आंतरिक सुरक्षा समस्या होने तक सी‍मित नहीं रहा है, यह एक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और वैचारिक चुनौती बनती जा रही है। इसे समझने और इससे निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सरकार, समाज और प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।इस दिशा में हम अपने स्‍तर पर जो कर सकते हैं, वह अवश्‍य करें, यही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

 

 

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