Uttarakhand: भाजपा में दबाव का खेल शुरु, चुनाव से पहले ही परिवारवाद का चेहरा आया सामने
– भाजपा में आखिर कौन है बड़ा पार्टी या नेता?

बीजेपी का ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ वाला बयान क्या अब केवल बयान रह गया है, जबकि पार्टी के नेता ही इसे कोई तव्वज्जो देने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ जहां पार्टी अन्य पार्टियों पर परिवारवाद को लेकर लगातार आरोप लगाती रही है, वहीं अब उत्तराखंड में पार्टी के ही चंद बुजूर्ग नेताओं की ऐसी ही मंशा साफ तौर से देखने को मिल रही है। तभी तो वह तां उम्र चुनाव में रहना चाहते हैं, और यदि उनको लेकर कोई दबाव भी बनाया जाता है तो कहने लगते हैं कि वह खुद खड़े ना हो सके तो अपने पुत्र को खड़ा करना चाहते हैं। उनके ये चंद शब्द पार्टी पर दबाव बनाने का कार्य करते हैं।
इनमें से कुछ तो पूरी तरह परिवारवाद में डूबने के चलते स्वयं तो जनता के लिए कभी कुछ खास (जनता की समस्याओं का निदान) कर नहीं सके, लेकिन सत्ता में सदैव अपने परिवारवाद को आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। यहां तक की कई जगह तो किसी नए को आने से रोकने के लिए यह अनेक हथकंडे भी अपनाने से पीछे न रहने की स्थिति में दिखते हैं।
खैर अब बात करें जनता कि तो राजनीति के जानकारों का मानना है कि कई बुजूर्ग नेता अपने कार्यकाल में विजन की कमी के चलते अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं का निदान तो कर नहीं पाए, लेकिन अब वही अपने बच्चों या परिवारजनों को अपनी जगह लाना चाहते हैं। खास बात ये भी है कि उनके पास भी विजन नहीं है, कुल मिलाकर यह पुनः जनता का शोषण करना चाहते हैं, कारण यह है कि यदि इनके बच्चों (जिन्हें वह उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं) के पास ही क्षेत्र के विकास व जनता की सेवा का विजन होता तो क्या यह अपने पिता या अपने राजनैतिक गुरु को बता कर उनको आगे नहीं बढ़ा सकते थे यानी उनके द्वारा क्षेत्र की समस्याओं का निदान नहीं करा सकते थे।
लेकिन, नहीं कारण वही है कि ना तो इस तरह के पुराने नेताओं के पास विजन (क्षेत्र की तरक्की का) है ना ही उनके बच्चों के पास लेकिन, हाथ में आया नेता का पद निकल ना जाए। इसी को देखते हुए यह अपने बच्चों ( उत्तराधिकारियों) को आगे बढ़ाना चाह रहे हैं और कुछ इस तरीके से कह रहे हैं जैसे पार्टी को धमका रहे हों। इनका पूरा कहने का मतलब जो समझ में आता है उसके अनुसार अगर हम नहीं तो पूरी पार्टी (क्षेत्र में) ही नहीं, क्या पार्टी इन पर भरोसा कर सकती है या पार्टी को इनकी बातों को सीरियसली लेना चाहिए? और यदि पार्टी इनकी बात मान लेती है तो यह साफ दर्शाता है कि ”पार्टी ही हमारी मां है” ये वाक्य ही झूठा साबित होगा।
प्रदेश के कई नेताओं की बोली या उनके इशारे साफ तौर पर, मैं नहीं तो मेरे बच्चे या मेरे परिवार से कोई की ओर इशारा करते दिख रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो स्वाभाविक रूप से भाजपा की परिवारवादी वाली बात न केवल आगे के लिए खत्म हो जाएगी, बल्कि भविष्य में इस बात का खास तौर पर भाजपा को विशेष नुकसान भी सहने को तैयार रहना पड़ेगा।
एक उदाहरण : मैं चुनाव लड़ूंगा वरना मेरा बेटा:
पिछले दिनों (फरवरी 2026 में) भाजपा के एक विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एक बार फिर अपने तेवरों से सुर्खियों में हैं। मीडिया को दिए एक बयान में उन्होंने कहा कि मैं तो रिटायर नहीं हुआ हूं, अभी दो टर्म मेरा चलेगा ही चलेगा… पार्टी रिटायर कर देगी तो क्या करूंगा। मैं चाहता हूं कि मेरे बेटे को टिकट मिले। वह लंबे समय से क्षेत्र में मेहनत कर रहा है। आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच, विधायक ने दावेदारी को लेकर जो रुख अख्तियार किया है, उसने न केवल विरोधियों बल्कि पार्टी के भीतर सक्रिय अन्य दावेदारों की भी धड़कनें बढ़ा दी हैं। उन्होंने साफ शब्दों में रिटायरमेंट की अटकलों को खारिज कर दिया है। उन्होंने पहली बार खुलकर अपने बेटे के लिए बैटिंग की है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि पार्टी उन्हें मौका नहीं देती है तो उनका बेटा ही इस सीट से प्रबल दावेदार होगा।
सोशल मीडिया पर अजब पोस्टर और उन पर लोगों का गजब रिएक्शन-

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75 साल के भाजपा के बड़े नेताओं पर नीति का असर:
– 75 प्लस फॉर्मूले का असर मुरली मनोहर जोशी पर भी हुआ था।
– इसी के साथ करिया मुंडा पर भी इसका असर हुआ था। 2019 में उनके खूंटी सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन करिया मुंडा इस फॉर्मूले की वजह से रेस से बाहर
– पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन जिन्हें लोग ताई के नाम से भी बुलाते थे वो भी इस 75 प्लस फॉर्मूले की शिकार हुई थी। 2019 में इंदौर लोकसभा सीट से उनके इंदौर लोकसभा सीट से उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन 76 साल होने की वजह से महाजन पिछड़ गईं।
– वहीं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल गौर इस फॉर्मूले के तहत ही राजनीति से अलग हो गए थे। 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने गोविंदपुरा से गौर का टिकट काट दिया।
– इनके अलावा बीजेपी के 75 प्लस फॉर्मूले का असर कुसुम महदेले, कुसुम महदेले, हुकुमदेव नारायण और शांता कुमार पर भी देखने को मिला था। ये सभी नेता अपने समय मे एक फायरब्रांड नेता थे। लेकिन बाद में पार्टी में 75 प्लस फॉर्मूले की वजह से उन्हें राजनीति से हटना पड़ा था।
बड़ा उदाहरण : जब कभी पार्टी नेता से छोटी हुई तब हारी
भाजपा के लिए एक बड़ा उदाहरण मध्यप्रदेश की बालाघाट सीट है। जहां 2023 विधानसभा चुनाव में पहले पार्टी के मूल्यों को छोटा कर (परिवारवाद के तहत) पहले पुराने कद्दावर नेता गौरी शंकर बिसेन (भाजपा के सांसद व विधायक भी रह चुके) के दबाव में उनकी बेटी मौसम को टिकट दिया फिर अपनी नीति को कमजोर करते हुए वापस गौरी शंकर को चुनाव में उतारा, पर जनता ने पार्टी को इसका जवाब देते हुए जहां भाजपा मजबूत मानी जाती रही है वहीं (बालाघाट में) उन्हें वहां हरा दिया था।
