Uttarakhand Special- देवभूमि उतराखंड की अनोखी घुघुतिया परंपरा यानी काले कौआ पर्व
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काले कौआ काले, घुघुत की माला खाले…

मकर संक्रांति हिंदुओं का एक प्रमुख पर्व है। जिसे सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन से उत्तरायण की शुरुआत होती है। जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। इसे फसल कटाई के त्योहार के रूप में भी मनाया जाता है और तिल-गुड़ के सेवन और दान-पुण्य की परंपरा विशेष महत्व रखती है।
उत्तराखंड में मकर संक्रांति का उत्सव :
उत्तराखंड के खासकर कुमाऊं क्षेत्र मकर संक्रांति को ‘घुघुतिया’ या ‘काले कौए’ के नाम से भी जाना जाता है। यहां यह पर्व अलग ही उल्लास और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे “घुघुतिया” और “घी त्यार” के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व खासतौर पर बच्चों से जुड़ा होता है और इसकी सबसे बड़ी पहचान होती है गेहूं के आटे और गुड़ से बनी खास मिठाई “घुघुती”। इन घुघुतियों को धागे में पिरोकर माला बनाई जाती है और बच्चों के गले में पहनाई जाती है।

घुघुतिया की परंपरा : उत्तराखंड में लोग इस दिन गेहूं के आटे और गुड़ से बने मीठे पकवान ‘घुघुत’ के नाम से प्रसिद्ध हम सभी के घरों में बनाए जाते हैं। मुख्य रुप से देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों में इस दिन लोग सुबह-सुबह घरों की छत या आँगन में जाकर वहां खिचड़ी, घुघुत, उड़द के बडे आदि को रखते हैं और बच्चे घुघुत की माला पहन कर कौओं को पुकारते हैं। – काले कौआ काले, घुघुत की माला खाले…

मान्यता: घुघुती त्यौहार / काले कौआ
घुघुती त्यौहार के पीछे कई लोककथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार यह पर्व बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि घुघुती की माला बच्चों को बुरी नजर से बचाती है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि लाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन जहां सूर्य के उत्तरायण होने से स्नान-दान और पूजा का विशेष महत्व है। वहीं इस दिन पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है, ऐसे में कौआ को खाना देना विशेष माना गया है। कौआ को सनातन संस्कृति में पितृों से जोड़ा (संदेशवाहक) गया है। इसी कारण इस दिन कौआ को दिया गया भोजन पितृों की तृप्ति के लिए भी विशेष माना गया है।
माना जाता है कि इस परंपरा से घर में समृद्धि आती है और बच्चों का भविष्य उज्जवल बनता है।
उत्तरायणी मेला : कर्णप्रयाग, बागेश्वर और उत्तरकाशी जैसे स्थानों में उत्तरायणी मेले की विशेष धूम रहती है। लोक नृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्थानीय वस्तुओं का व्यापार इस मेले की पहचान है।
पारंपरिक भोजन : इस दिन उत्तराखंड के घरों में तिल के लड्डू, झंगोरा की खीर, अरसा – पूआ और मक्के की रोटी जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं जो एक तरह से उत्तराखंड की संस्कृति को दर्शाते हैं।
दरअसल मकर संक्रांति, पहाड़ियों के लिए केवल एक त्योहार ही नहीं है, यह हम सभी को हमारी संस्कृति से जोड़े रखने का एक साधन भी है। यह पर्व हमें नई ऊर्जा, प्रेम और सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहना सिखाता है।
