March 8, 2026

Army Day Special: जब युद्ध बंदी बेटे को छोड़ने के लिए तैयार था पाक, सेना प्रमुख करियप्पा ने ठुकरा दिया था ऑफर

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– अयूब खान से कहा- अब वह…

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करियप्पा भारत के पहले सेनाध्यक्ष थे। उन्होंने 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना का नेतृत्व किया था।

15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल कोडंडेरा माधप्पा करियप्पा (के एम करियप्पा) ने भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ का पदभार ग्रहण किया था।

उससे पहले, स्वतंत्र भारत की सेना की कमान ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस रॉय बुचर के पास थी। वे भारतीय सेना के अंतिम ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ थे।

15 जनवरी : भारतीय हाथों में आई थी सेना की कमान
15 जनवरी 1949 को कमान पूरी तरह भारतीय हाथों में आई। यह दिन शहीदों को श्रद्धांजलि देने, वर्तमान सैनिकों के समर्पण को सलाम करने और सेना की उपलब्धियों को याद करने का अवसर है।

हर साल 15 जनवरी को आर्मी-डे परेड और शक्ति प्रदर्शन होता है। जिसमें गैलेंट्री अवॉर्ड (वीरता पुरस्कार) और सेना मेडल वितरित किए जाते हैं। इस मौके पर हम करियप्पा के कुछ रोचक किस्सों के बारे में बात करने जा रहे हैं।

करियप्पा के बेटे को पाकिस्तान ने बनाया था युद्धबंदी
दरअसल, 1965 के भारत-पाक युद्ध में फील्ड मार्शल करियप्पा के बेटे व फ्लाइट लेफ्टिनेंट केसी नंदा करियप्पा का विमान पाकिस्तान में जा गिरा था। जिसके बाद उन्हें युद्धबंदी बना लिया गया।

उस वक्त, पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान थे। जो भारत-पाक विभाजन से पहले सेना में करियप्पा के अधीन काम कर चुके थे। उन्होंने फोन पर केएम करियप्पा से कहा कि उनके बेटे को विशेष व्यवहार देकर जल्द रिहा कर दिया जाएगा।

बेबाकी से दिया अयूब खान को जवाब
इतना सुनने के बाद भी करियप्पा नहीं टूटे। उन्होंने अयूब खान को बेबाकी से जवाब दिया। करियप्पा ने कहा- अब वह सिर्फ मेरा बेटा नहीं रहा, वह भारत का सैनिक है। उसके साथ अन्य युद्धबंदियों जैसा ही व्यवहार किया जाए। या तो सभी कैदियों को रिहा करो या किसी को नहीं। कोई विशेष छूट नहीं।

यह किस्सा भारतीय सेना में समानता और सिद्धांत की मिसाल बन गया। नंदा बाद में रिहा हुए। उन्हें वीर चक्र भी मिला। इसके अलावा, नंदा बाद में एयर मार्शल भी बने।

1965 में भारत-पाक के बीच क्यों हुआ था युद्ध?
भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 का जंग कश्मीर विवाद को लेकर हुआ था। यह युद्ध 5 अगस्त 1965 से शुरू हुआ था। इसके बाद, 23 सितंबर 1965 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम के साथ खत्म हुआ।

वहीं, 10 जनवरी 1966 को सोवियत संघ की मध्यस्थता में ताशकंद समझौता हुआ, जिसमें दोनों ने युद्ध के दौरान कब्जे वाले क्षेत्र को वापस करने पर सहमति जताई।

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