March 8, 2026

कुत्तों को खाना खिलाते हैं तो जिम्मेदारी भी लें, सुप्रीम कोर्ट की दो टूक टिप्पणी

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और कुत्तों के काटने की घटनाओं को लेकर सख्त रुख अपनाया है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने चेतावनी दी कि अगर किसी आवारा कुत्ते के काटने से किसी व्यक्ति की मौत होती है या बच्चे और बुजुर्ग घायल होते हैं, तो हर मामले में संबंधित राज्य सरकार को मुआवजा देना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह जिम्मेदारी राज्य की है, क्योंकि उन्होंने समय रहते इस समस्या को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने उन लोगों पर भी तीखी टिप्पणी की, जो कुत्तों को सड़क पर खाना खिलाते हैं और खुद को उनका हितैषी मानते हैं।

उन्होंने सवाल किया, “अगर आपको कुत्तों से इतना लगाव है, तो उन्हें अपने घर ले जाइए। कुत्ते सड़कों पर क्यों घूम रहे हैं, लोगों को काट रहे हैं और डर फैला रहे हैं?” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ भावनाओं के आधार पर इस गंभीर समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी के कथन कि आवारा कुत्तों का मुद्दा भावनात्मक है, पर बेंच ने जवाब दिया कि अब तक भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए ही दिखाई दी हैं। गुरुस्वामी ने इसके जवाब में कहा कि वह इंसानों के लिए भी उतनी ही चिंतित हैं।

सुप्रीम कोर्ट में कुत्ते के काटने की शिकार एक महिला ने भी अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वह इस बात से सहमत हैं कि अगर एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) कार्यक्रम को सही तरीके से लागू किया जाए, तो कुत्तों की संख्या और उनकी आक्रामकता दोनों नियंत्रित की जा सकती हैं।

लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि एक कुत्ते ने उन्हें बिना किसी उकसावे के काट लिया। महिला ने कहा कि वह यह जानना चाहती हैं कि उस कुत्ते ने उन पर हमला क्यों किया।

पीड़िता ने बताया कि वह कुत्ता लंबे समय से क्रूरता का शिकार रहा था। लोग उसे लात मारते, पत्थर फेंकते थे, जिससे उसमें डर और रक्षात्मक आक्रामकता पैदा हो गई थी। महिला ने कहा कि वह किसी और की क्रूरता की सजा भुगत रही थीं, जबकि उसकी कोई गलती नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका इरादा सड़कों से हर कुत्ते को हटाने का नहीं है। अदालत ने कहा कि उसके निर्देश पशु जन्म नियंत्रण नियमों के तहत आवारा कुत्तों के प्रबंधन से संबंधित हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि कुत्ते उन लोगों को पहचान सकते हैं जो उनसे डरते हैं या जिन्हें पहले काटा गया हो, और ऐसे लोगों पर हमला कर सकते हैं।

सीनियर वकील सी यू सिंह ने अदालत को बताया कि दिल्ली जैसे शहरों में चूहों की समस्या गंभीर है और बंदरों का आतंक भी एक अलग चुनौती है।

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कुत्तों को अचानक हटा दिया गया, तो चूहों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है, जिसके गंभीर स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी परिणाम हो सकते हैं। इस पर जज मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि कुत्ते और बिल्लियां एक-दूसरे के दुश्मन हैं, और बिल्लियां चूहों को मारती हैं, इसलिए बिल्लियों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि आवारा कुत्तों का मुद्दा सिर्फ जानवरों का नहीं, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर विषय है। कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि अब लापरवाही की कीमत राज्य सरकारों को मुआवजे के रूप में चुकानी पड़ेगी और समस्या का संतुलित, व्यावहारिक और जिम्मेदार समाधान निकालना ही एकमात्र विकल्प है।

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