March 8, 2026

धनतेरस: उज्जैन के सांदीपनि आश्रम और महाकाल मंदिर में उमड़ेंगे श्रद्धालु

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kuber temple

– कुबेर की नाभि में इत्र अर्पित करने से धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य की वर्षा

धनतेरस पर उज्जैन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एक अद्भुत परंपरा निभाने पहुंचेंगे। सांदीपनि आश्रम और महाकालेश्वर मंदिर के कौटितीर्थ कुंड के समीप स्थित प्राचीन कुबेर प्रतिमा पर विशेष पूजा-अर्चना होगी। परंपरा के अनुसार, इस दिन श्रद्धालु कुबेर की नाभि में इत्र अर्पित कर सुख-समृद्धि और धनवृद्धि की कामना करते हैं। ‘नाभौ इत्रं समर्प्यते, लक्ष्मीकुबेर प्रसीदतु’ का अर्थ है- कुबेर की नाभि में इत्र अर्पण करने से लक्ष्मी और कुबेर दोनों प्रसन्न होते हैं। कथा के अनुसार, भगवान शिव से धन के देवता का पद मिलने पर ब्रह्मा ने कुबेर से पूछा कि धन का संचित स्रोत कहां रहेगा। तब कुबेर ने कहा- मेरा उदर और विशेष रूप से नाभि ही धन का केंद्र होगी। इस पर देवताओं ने उनकी नाभि में इत्र और पुष्प अर्पित कर धन और समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। तभी से यह परंपरा प्रचलित हुई कि कुबेर की नाभि में इत्र लगाने से धन का स्थायित्व और शुभ संपत्ति की वृद्धि होती है।

श्रीकृष्ण को मिला ‘श्री’ का वरदान

मान्यता है सांदीपनि आश्रम में शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब गुरु दक्षिणा का समय आया तो देवताओं की ओर से कुबेर धन लेकर आश्रम पहुंचे। गुरु सांदीपनि ने खजाना लौटा दिया। श्रीकृष्ण को आदेश दिया कि वे शंखासुर से उनके पुत्र को मुक्त कराएं। ऐसा करने पर प्रसन्न होकर गुरु-माता ने ‘श्री’ प्रदान की, तभी वे ‘श्रीकृष्ण’ कहलाए। कहा जाता है, कुबेर आश्रम में विराजमान हो गए।

परमारकालीन 1100 वर्ष पुरानी प्रतिमा
सांदीपनि आश्रम परिसर में 84 महादेवों में से 40वें क्रम पर स्थित श्री कुण्डेश्वर महादेव मंदिर के गर्भगृह में यह दुर्लभ कुबेर प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पुजारी पं. शैलेंद्र व्यास ने बताया कि प्रतिमा में कुबेर बैठे हुए हैं, एक हाथ में सोम पात्र और दूसरा वर मुद्रा में है। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, यह प्रतिमा परमारकालीन है और लगभग 1100 वर्ष पुरानी है। प्रतिमा में कुबेर के कंधों पर धन की पोटलियां, उभरा हुआ पेट, तीखी नाक और अलंकारित शरीर उनकी ऐश्वर्यपूर्ण छवि को दर्शाते हैं।

महाकालेश्वर मंदिर में विशेष पूजन
प्राचीन मान्यता है कि उज्जैन ही वह भूमि है जहां भगवान कुबेर ने कठोर तप कर धनाधिपति का पद प्राप्त किया था। कोटितीर्थ के समीप स्थित कुबेर प्रतिमा की धनतेरस और दीपावली पर विशेष पूजा होती है। श्रद्धालु इस दिन नाभि में इत्र चढ़ाकर घर में धनवर्षा और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

देश-प्रदेश के प्रमुख कुबेर मंदिर
अल्मोड़ा: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित जागेश्वर मंदिर समूह में धन के देवता भगवान कुबेर का विशेष मंदिर स्थित है। इस मंदिर को ‘कुबेर मंदिर’ कहा जाता है, जो भक्तों को सिर्फ आस्था से नहीं, बल्कि असल समृद्धि की ओर भी मार्गदर्शन करता है। इस क्षेत्र में घने देवदार के जंगलों के बीच स्थित, ये मंदिर समूह न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी अद्भुत वास्तुकला और चमत्कारी आशीर्वाद भी लोगों को आकर्षित करते हैं। यहां पर भगवान कुबेर का एक मंदिर भी है, जो समृद्धि और धन के देवता माने जाते हैं। उत्तराखंड में कत्यूरी राजवंश द्वारा निर्मित इस क्षेत्र में 7वीं से 14वीं शताब्दी के बीच बने मंदिरों में कुबेर की पूजा एकलिंग रूप में होती है।

मंदसौर: यहां की कुबेर प्रतिमा लगभग 1300 वर्ष पुरानी है। कुबेर को नेवले पर सवार दिखाया गया है, हाथों में धन की पोटली, शस्त्र और प्याला हैं।

ओंकारेश्वर: मध्य प्रदेश के तीन प्रमुख कुबेर मंदिरों में यह सबसे प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कुबेर देव ने यहां घोरतपस्या कर शिवलिंग कीस्थापना की थी।

वडोदरा: नर्मदा नदी तट स्थित यह मंदिर लगभग 2500 वर्ष पुराना माना जाता है। धनतेरस और दीपावली पर यहां बड़ी श्रद्धा से दर्शन किए जाते हैं।

काशी विश्वनाथ: वाराणसी में भगवान शिव के साथ कुबेर की मूर्ति भी विराजमान है, जो धन और वैभव की रक्षा करते हैं।

कांचीपुरम: तमिलनाडु में प्राचीन शिल्पकला से निर्मित यह मंदिर दक्षिण भारत में कुबेर उपासना का ऐतिहासिक केंद्र माना जाता है।

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