अल्मोड़ा का दशहरा महोत्सव: कूुल्लू के बाद देश में बाद देश में सबसे मशहूर है

कुमांऊं की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा का दशहरा पहोत्सव कुल्लू के बाद देश का दूसरा सबसे मशहूर आयोजन है। यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर और पीढ़ियों से चली आ रही सामूहिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।
समृद्ध परंपराएं और जीवंत सांस्कृतिक विरासत अल्मोड़ा की पहचान रही हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है दशहरा महोत्सत। इसने समय के साथ अपनी विशिष्टता को बरकग़र रखा है। यहां रामलीला और दशहरा के श्रीराम महिमा मंडन और विजय प्रतीक तक सीमित नहीं है। यहां पूरे रावण कुल के पुतले कला सौंदर्य के साथ बनाए जाते हैं और उनका दहन कई दशकों से स्वतः स्फूर्त नगर महोत्सव की तर्ज पर होता है। वास्तव में यह लोककला, परंपरा और सामुदायिक सहभागिता का उत्सव है।
अल्मोड़ा में दशहरा का इतिहास
पुराने लोग बताते हैं कि वर्ष 1952 में अल्मोड़ा के लाला बाजार में सबसे पहला रावण का पुतला बनाया गया था। उस दौर में अयोध्या प्रसाद अग्रवाल और सोहन लाल अग्रवाल ने इसकी शुरुआत की थी। इसके बाद अमरनाथ वर्मा ने इस परंपरा को जीवित रखा।
वर्ष 1976 में जौहरी बाजार में मेघनाद का पुतला तैयार हुआ और धीरे-धीरे नगर के विभिन्न मोहल्लों ने भी पुतले बनने की जिम्मेदारी उठाई। रावण कुल को भी शान से सजाने को तहजीब अल्मोड़ा में दशहरे के मौके पर नगर के अलग-अलग हिस्सों में रावण कुल के 18 से 20 पुतले बनाए जाते हैं। इनमें रावण, कुभकर्ण, मेघनाद, अहिरावण, ताड़का, अतिकाय, प्रकरासुर, निकुंभ, कालकासुर, खर समेत अन्य पात्र शामिल हैं। प्रत्येक पुतला अपनी कलात्मकता और भव्यता में अद्वितीय होता है।
दशहरा महोत्सव समिति से जुड़े लोग बताते हैं कि एक पुतले के निर्माण में 25 से 30 हजार रुपये का खर्च आता है। पुतला कमेटियां हफ्तों पहले से बांस, कपड़े, रंग और सजाबट का सामान जुटाने लगती हैं। कलाकार तन्मय होकर इन पुतलों को गढ़ते हैं। नए वस्त्र और आकर्षक रूप सज्जा से सजाए गए पुतले इतने जीवंत प्रतीत होते हैं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठते हैं।
अल्मोड़ा में हुई थी कुमाऊं की पहली रामलीला
सांस्कृतिक नगरी के बद्रेश्वर मोहल्ले से हो कुमार कौ पहली रामलीला की शुरुआत हुईं थी। वर्ष 1860 में यहां सबसे पहले रामलीला मंचन हुआ था। तब तत्कालोन सदर अमीन बद्री दत्त जोशी ने रामलीला मंचन शुरू कराया था। बद्रेश्वर के बाद कुमाऊं में अन्य स्थानों पर रामलीला मंचन शुरू हुआ। इसके बाद वर्ष 1897 में पिथौरागढ़ में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवी दत्त सकड़िया ने रामलीला कराई। वर्ष 1912 में नैनीताल के मल्लीताल में पहली बार कृष्ण साह ने रामलीला मंचन कराया। वर्ष 1931 में जानकी नाथ जोशी ने शिमला में कुमाऊंनी रामलीला का मंचन कराया था। वर्तमान में नंदादेवी, हुक्का क्लब, घारानौला, राजपुरा, खात्याड़ी, कर्नाटकखोला, खोल्टा, एनटीडी में रामलीला का मंचन किया जाता है। वरिष्ठ रंककर्मियों के अनुसार बर्ष 1850 में लाइटिंग की बेहतर व्यवस्था नहीं थीं। तब चीड़ के छिलकों की रोशनी, मशाल, गैस की रोशनी से रामलीला मंचन किया गया था।
रामडोला, रावण परिवार के पुतलों का जलुस साथ
विजयादशमी के दिन नगर मे रावण कुल के पृतलों का भव्य जुलुस निकलता है। पुतलों के साथ पुतला कमेटी से जुड़े युवाओं की टोलियां ढोल नगाड़ों की थाप और बैंड के धुन पर नृत्य करते हुए आग-आगे चलती है। आतिशबाजी और रंगारंग के कार्यक्रम के बीच पुतलों का दहन किया जाता है। रामडोले में विराजमान राम के पुतलों द्वारा तीर चलाने के साथ ही पुतले धूं-धूं कर जलने लगते हैं।
